Friday, April 12, 2013

TV पर खबरों की धार और रफ्तार समाचार




आजकल भारत के समाचार चैनलों पर स्पीड न्यूज़ का बोलबाला है। स्पीड न्यूज़ यानी तेज़ रफ्तार खबरें, तेजी से खबरों को पेश करने का तरीका। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास आराम से बैठकर टेलीविजन पर न्यूज़ बुलेटिन देखने का वक्त नहीं होता और लोग जल्दी-जल्दी दिन की तमाम प्रमुख खबरों की जानकारी चाहते हैं- इसी समझदारी के तहत सन 2002 के आसपास कई भारतीय निजी समाचार चैनलों पर स्पीड न्यूज़ के बुलेटिन शुरु किए गए थे। जल्दी-जल्दी खबरे, ढेर सारी खबरें, खबरों का पूरा डोज़ जैसी कई टैगलाइन और न्यूज़ टॉप 10, टॉप 10 प्लस, न्यूज़ नॉनस्टॉप, स्पीड न्यूज़, रफ्तार समाचार जैसी अलग-अलग आकर्षक ब्रांडिंग के तहत समाचार चैनलों पर तेज़ी से खबर देनेवाले बुलेटिन शुरु किए गए। शुरुआती दौर में इस तरह के बुलेटिन्स के लिए जो स्लॉट तय किए गए, उनमें खास ख्याल दर्शकों की जल्दबाजी का रखा गया यानी ऐसा वक्त जब लोग जल्दी-जल्दी खबरें देखना चाहते हों। मसलन सुबह दफ्तर जाने से पहले और रात को सोने से पहले। ज़ी न्यूज़ पर सन 2003 में जब इस तरह के बुलेटिन का सफल प्रयोग हुआ तो इसके प्रसारण का स्लॉट सुबह साढ़े 8 बजे रखा गया था- ऐसा वक्त जब लोग तेजी से खबरों पर नज़र डालकर काम पर चलना चाहते हों। न्यूज टॉप टेन नाम के इस बुलेटिन को खूब पसंद किया गया और कई बरसों तक टीआरपी की होड़ में चैनल को आगे बढ़ाए रखने में इसका खास योगदान रहा। न्यूज टॉप टेन में 7 सेगमेंट होते थे, जिनमें हेडलाइन खबरों के अलावा देश, राजनीति, अपराध, मेट्रो, खेल और सिनेमा की 10-10 खबरों को समेटा जाता था। हर सेगमेंट की अवधि लगभग 3 मिनट से ज्यादा नहीं हुआ करती थी। इस तरह आधे घंटे में 70 खबरें दिखाने का नया तरीका शुरु किया गया। आगे चलकर इसी चैनल पर इसी कड़ी में रात के 11-11.30 बजे के स्लॉट के लिए टॉप टेन प्लस नाम के तेज़ रफ्तार बुलेटिन की शुरुआत हुई, जिसमें हर सेगमेंट करीब 4 से साढ़े 4 मिनट का होता था, यानी खबरों को कुछ और विस्तार से दिखाने की गुंजाइश थी। 2003 से 2005 के दो साल के दौरान लगभग हर निजी समाचार चैनल पर स्पीड न्यूज़ बुलेटिन्स के स्लॉट तय हो गए। टीआरपी की रेटिंग्स के मुताबिक, प्रतियोगिता में एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में न्यूज़ चैनल्स ने अपने-अपने तरीके से स्पीड न्यूज़ बुलेटिन्स की नई-नई ब्रैंडिंग  की और उन्हें आकर्षक तरीके से पेश करने लगे। टीवी पर रफ्तार को पसंद किया जाने लगा और इस हद तक पसंद किया जाने लगा कि 2005 में देश के टेलीविजन समाचार जगत में अग्रणी आजतक चैनल के समूह टीवी टुडे नेटवर्क ने तो इसी रफ्तार पर आधारित पूरा का पूरा न्यूज़ चैनल ही लांच करने की तैयारी कर ली और 2 अगस्त 2005 को तेज़ नाम से नए समाचार चैनल को लांच भी कर दिया गया। तेज़ को लांच करने से ज्यादा बड़ी चुनौती थी खबरों की रफ्तार के साथ-साथ उनकी ताजगी को बरकरार रखना ताकि दर्शक को बांधे रखा जाए, उन्हें ऊबने न दिया जाए। तेज़ भारतीय समाचार चैनलों में नवीनतम प्रयोग था जिसने खबरें फटाफट की टैगलाइन के साथ जल्दी ही दर्शक वर्ग में खास पहचान बना ली और इस पहचान को बरकरार भी रखा है। तेज़ के साथ हिंदी टेलीविजन समाचार जगत में एक नया अध्याय जुड़ा है और इस तरह के टेलिविजन प्रसारण की अपनी चुनौतियां भी सामने आई हैं। ज़ाहिर है टीवी टुडे के अलावा और कोई भी टीवी समाचार समूह इस तरह के चैनल को लांच करने की कोशिश नहीं कर सका। लेकिन तब से अब तक आम तौर पर तमाम न्यूज़ चैनलों पर स्पीड न्यूज़ के स्लॉट जरूर बढ़ गए, उनमें काफी नए प्रयोग और प्रस्तुति के नए-नए तरीके देखने को मिल रहे हैं।
तेज़ चैनल की शुरुआत आधे घंटे में दो तेज़ रफ्तार न्यूज़ बुलेटिन्स के कॉन्सेप्ट के साथ हुई थी। आगे चलकर खेल, सिनेमा और दूसरी विधाओं में फास्ट न्यूज़ के बुलेटिन्स भी शुरु किए गए। इस दौरान रफ्तार समाचार की होड़ इस कदर बढ़ी कि चैनलों पर बुलेटिन्स की वेराइटी देखने को मिलने लगी। इससे पहले तत्कालीन स्टार न्यूज़ 24 घंटे 24 रिपोर्टर नाम से फास्ट न्यूज़ बुलेटिन की शुरुआत कर चुका था। समय के साथ चलते हुए आजतक ने भी 50 खबरों, 100 खबरों और टॉप 5 जैसे फास्ट न्यूज़ बुलेटिन शुरु किए, जिन्हें आमतौर पर सुबह, दोपहर और रात के वक्त पेश किया जाता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींचा जा सके। हिंदी के दूसरे समाचार चैनलों सहारा समय और इंडिया टीवी ने भी समय के साथ अपने बुलेटिन्स में बदलाव किए और फास्ट न्यूज़ के कई नए बुलेटिन शुरु किए। चैनल 7 से IBN7 बने चैनल पर भी सुबह और रात के वक्त स्पीड न्यूज़ के स्लॉट तय हैं।
समाचार चैनलों पर खबरों को तेज़ तरीके से दिखाने की होड़ इतनी बढ़ी कि 50 खबरों और 100 खबरों से आगे आधे घंटे में 200 खबरें तक दिखाने के दावे करनेवाली ब्रैंडिंग के बुलेटिन भी चैनलों पर पेश किए जाने लगे हैं। इंडिया टीवी पर 20 रिपोर्टर, 5 मिनट में 25 खबरें, 10 मिनट में 100 खबरें, आधे घंटे में 200 खबरें जैसे कितने ही बुलेटिन्स नए कलेवर में पेश किए जा रहे हैं। वहीं स्टार से एबीपी न्यूज़ बने समाचार चैनल पर खबरें फटाफट, 500 सेकेंड जैसे बुलेटिन भी देखने को मिल रहे हैं, जिनमें खबरों की रफ्तार भले ही तेज़ न हो, लेकिन पहचान वही रखी जाती है। तेज़ रफ्तार में खबरें पेश करने की मार्केटिंग बुलेटिन्स पर इस कदर हावी हो चुकी है कि अब खबर 30 सेकेंड में, 1 मिनट में दिल्ली, 1 मिनट में मुंबई, जैसे बुलेटिन भी दिखाए जा रहे हैं, जिनमें कभी-कभी एक दो खबरें ही होती हैं और दर्शक पलभर में कई बड़ी खबरें देखने की मानसिकता लेकर चैनल पर बंधा रह जाता है। यही स्थिति एबीपी के फटाफट बुलेटिन की भी है, जिसमें तमाम बड़ी खबरों को समेटने की कोशिश होती है। लेकिन अगर कोई ब्रेकिंग या और बड़ी खबर हो, जिसे कुछ देर खींचने की जरुरत समझी जाए, तो संपादकीय नीति दूसरी तमाम खबरों को गैर-जरूरी मानकर छोड़ देते हैं। खबर की तात्कालिकता और सामयिकता का ख्याल करें तो ये बात काफी हद तक ठीक है, लेकिन ऐसे दर्शक जो किसी समय विशेष में एक साथ 5 या 10 ब़ड़ी खबरें देखने की मानसिकता लेकर चैनल का रुख करते हैं , वो ऐसी स्थिति में ठगे से रह जाते हैं। खैर, ये तो चैनलों की संपादकीय नीति पर निर्भर करता है कि किस बुलेटिन को किस तरह पेश किया जाए और किन खबरों को कितनी प्राथमिकता दी जाए। लेकिन आज के दौर में स्पीड न्यूज़ की जो बहुतायत देखने को मिल रही है, उसको लेकर बुलेटिन प्रस्तुति के कई पहलुओं पर गौर करना जरूरी हो जाता है।
समाचार चैनलों से जुड़ी सबसे अहम बात ये है कि दर्शक समाचार देखने के लिए इनका रुख करते हैं। और स्पीड न्यूज़ की सार्थकता इसी में है कि तेज़ से तेज़ रफ्तार में ज्यादा से ज्यादा समाचारों से दर्शकों को रू-ब-रू कराया जाए। खबर एक लाइन में भी होती है और उसे विस्तार दिया जाए तो शायद अखबार का एक पन्ना भी कम पड़ जाए। ऐसे में हमेशा ये संपादकीय नीति पर निर्भर करता है कि किस जानकारी को खबर की श्रेणी में रखा जाए और उसे कितनी अहमियत दी जाए। जाहिर है एक खबर अगर दिन भर के लिए ज्यादा अहम है, तो उससे जुड़ी दाएं-बाएं की पचासों खबरें और हो सकती हैं, जो बुलेटिन की सारी अवधि हजम कर लें। मुंबई में 26/11 के हमले जैसी किसी बड़ी घटना के मौके पर दूसरी किसी और प्रमुख खबर की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में संपादकीय नीति यही कहती है कि पूरा बुलेटिन एक ही प्रमुख घटना से जुड़ी दूसरी खबरों, जानकारियों और तथ्यों से भरा हो। ऐसे में स्पीड न्यूज़ के प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी और चुनौती और बढ़ जाती है क्योंकि एक तरफ उसे खबर को अपडेट करना होता है, तो साथ ही बुलेटिन की ब्रैंडिंग के तहत 10, 25, 50 या 100 खबरों की गिनती पूरी करने के लिए भी आइटम तैयार करने होते हैं। आतंकवादी हमलों, हादसों, चुनाव, बजट जैसे बड़े खबरिया दिनों के मौके पर तो सूचनाओं और उनसे जुड़ी तस्वीरों और बाइट की आवक भी काफी बढ़ जाती है। ऐसे में ये तय़ करना बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती का काम है कि आखिर किस एलिमेंट को बुलेटिन में शामिल किय़ा जाए और किसे छोड़ा जाए। बुलेटिन को अपडेट करते हुए भी नई खबरों और सूचनाओं के साथ-साथ विजुअल्स और बाइट्स का तार्किक तरीके से समावेश बड़ी चुनौती है। आम तौर पर तमाम चैनलों पर स्पीड न्यूज़ के बुलेटिन पूरी तरह से रिकॉर्डेड और एडिटेड होते हैं, जिससे लाइव परिस्थितियों में नई जानकारियां अपडेट करने की गुंजाइश कम होती है ,साथ ही साथ ये भी चुनौती होती है कि ऐसी कोई लाइन न तो स्क्रिप्ट या ना ही खबर पट्टियों में हो, जो पुरानी लगे। दूसरी तरफ जिन चैनलों में स्पीड न्यूज़ लाइव होते हैं, वहां भी समय से बुलेटिन को अपडेट करने और उनमें ताजगी बनाए रखना आसान नहीं।
बात स्पीड न्यूज़ की होती है, तो खबरों की प्रस्तुति की अहमियत भी काफी बढ़ जाती है। ऐसी अपेक्षा रहती है कि खबरें एक समान तेज़ गति में पढ़ी जाएं, स्क्रिप्ट के मुताबिक विजुअल और स्क्रीन पर पट्टियों के टेक्स्ट भी छोटे और पूरी खबर देने वाले हों ताकि खबरे दर्शक के दिलोदिमाग में पूरी तरह रजिस्टर हो सकें। ऐसे में स्क्रिप्ट लिखनेवालों की जिम्मेदारी है कि वो बुलेटिन के ड्यूरेशन के मुताबिक खबरों की छोटी-छोटी, सरल और प्रवाहमय भाषा में स्क्रिप्ट लिखें ताकि एंकर्स या वॉयस ओवर आर्टिस्ट के लिए उन्हें पेस बनाकर पढ़ने में दिक्कत न हो। साथ ही, ये एंकर्स और वॉयस ओवर आर्टिस्ट्स की भी जिम्मेदारी है कि वो स्क्रिप्ट को बुलेटिन की मांग के मुताबिक पढ़ने की मानसिकता के साथ खुद को तैयार रखें। अक्सर स्पीड न्यूज़ बुलेटिन्स में एंकर्स के फंबल करने या शब्दों को खा जाने की दिक्कतें पेश आती हैं। इसके लिए कभी एंकर तो कभी स्क्रिप्ट लेखक जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में एंकर्स को TP रीडिंग पर निर्भर रहने के बजाए मौके के मुताबिक खबरों की लाइन तय करने और उन्हें खुद ब खुद फ्रेम करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। चुंकि टेलीविजन समाचार प्रस्तुति टीम वर्क है, लिहाजा पैनल कंट्रोल रूम के सहयोगियों पर भी विजुअल, साउंड, ग्राफिक्स और बुलेटिन के दूसरे तत्वों को उचित तरीके से इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी बनती है ताकि बुलेटिन की रफ्तार बरकरार रहे और खबरों का तारतम्य बना रहे। बुलेटिन में अगर 10, 20 या 30 खबरों को शामिल करना हो, तो दर्शकों को स्क्रिप्ट और विजुअल के जरिए खबरों को रजिस्टर करने में दिक्कत नहीं होती। लेकिन जब 50, 100 और 200 खबरों के बुलेटिन की तैयारी हो, तो हमेशा ये ख्याल रखना चाहिए कि बंदूक की गोली की जिस रफ्तार से खबरें स्क्रीन पर गुजरेंगी, उन्हें दर्शक ग्रहण कर भी पाएगा या नहीं। ऐसे कई सफल प्रयोग चैनलों पर हो रहे हैं, लेकिन इस बात पर गौर करना और जरूरी है कि खबरों पर एक साथ आंख-कान और दिमाग का कंसेन्ट्रेशन होना मुश्किल है, ऐसे में स्पीड न्यूज़ प्रोड्यूसर्स को ये जरूर मान लेना चाहिए कि आपका दर्शक या तो स्क्रिप्ट की आवाज, या फिर तस्वीर या पट्टियों में दी जानेवाली जानकारी से ही खबर को रजिस्टर कर पाएगा। ऐसे में तीनों ही चीजें इतनी स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि अगर आवाज न सुन सके, तो विजुअल या फिर पट्टी से ही खबर की जानकारी हासिल हो जाए। न्यूज़ शतक, 100 बड़ी खबरें, न्यूज़ 100, 200 खबरें जैसे स्पीड न्यूज़ बुलेटिन्स की तैयारी में प्रोड्यूसर्स को ये भी ख्याल रखना चाहिए कि एक खबर को कम से कम 2 से तीन हिस्सों में तोड़कर पेश किय़ा जाए ताकि दर्शक पूरी तरह खबर से वाकिफ हो सके। ऐसे में वास्तविकता में खबरों की संख्या 40-50 तक सिमट सकती है, लेकिन दर्शक खबरों से महरूम नहीं रहेंगे। अगर ब्रैंडिंग के तहत 100 की 100 खबरें अलग हों, तो काफी संभव है कि कोई खबर तेजी से निकल जाए, और दर्शक उसे याद न रख सके। ऐसे में स्पीड न्यूज़ बुलेटिन की सार्थकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं क्योंकि वो असलियत में दर्शकों की खबरों की भूख मिटाने में बेअसर साबित हो सकता है। एक बड़ा सवाल ये भी है कि अगर 12 घंटे में 100 खबरों के तीन या चार बुलेटिन किसी चैनल पर पेश किए जाते हैं, तो क्या खबरें दोहराई नहीं जाएंगी और क्या उनकी ताजगी बरकरार रहेगी। ऐसी स्थिति में बुलेटिन को अपडेट करने की जिम्मेदारी अहम है। कुछ खबरें जरूर दोहराई जा सकती हैं, लेकिन ध्यान रखना होगा कि वो कितनी महत्वपूर्ण हैं और किस लिहाज से । खबरें कितनी भी बड़ी हों, और जानकारी के स्तर पर कोई अपडेट नहीं हो, तो भी दर्शकों की दिलचस्पी उनमें बनाए रखने के लिए उन्हें भाषा के स्तर पर अपडेट करने की गुंजाइश हमेशा रहती है। लिहाजा, स्क्रिप्ट और पट्टियों की भाषा और शब्दों में बदलाव पर जरूर ध्यान देना चाहिए। टीवी चुंकि विजुअल माध्यम है, लिहाजा तस्वीरों में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव होने चाहिए ताकि खबरों में धार भी बनी रहे और उनकी सार्थकता भी। खबरें रोचक हों और विजुअल बेहतरीन हों, पहले कभी देखे नहीं गए हों, तो उन्हें एक-दो बार जरूर दोहराना चाहिए, क्योंकि एक समझदारी ये भी है कि अच्छे विजुअल और रोचक खबरें देखना दर्शक पसंद करते हैं। आम तौर पर विदेशी एजेंसियों APTN , Reuters से आनेवाली खबरें ऐसी होती हैं, जिनमें जानकारी के स्तर पर बदलाव या उन्हें अपडेट करने की गुंजाइश कम से कम 12 घंटे तक नहीं रहती, तो दर्शकों की दिलचस्पी से जुड़ी इस समझदारी का फायदा उठाते हुए स्क्रिप्ट और पट्टियों को और बेहतर बनाते हुए उन्हें कई बार दिखाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
आम आदमी की जिंदगी भागमभाग वाली है, तेज़ रफ्तार से चल रही है, ऐसे में टेलीविजन समाचार को सबसे कड़ी टक्कर, रेडियो और टैबलेट जैसे समाचार संचार माध्यमों से होनेवाली है, जिनके इस्तेमाल से इंसान आजकल कहीं भी खबरों से वाकिफ हो सकता है। रेडिय़ो तो पहले भी टेलीविजन समाचार को कुछ हद तक टक्कर देता रहा है, स्पीड न्यूज़ के बुलेटिन्स की शुरुआत की एक छिपी हुई वजह या प्रेरणा आकाशवाणी के सुबह और रात के प्राइम बुलेटिन भी हो सकते हैं, जो लोगों को खबरों की भरपूर जानकारी मुहैया कराने का सशक्त माध्यम रहे हैं। नए जमाने में इंटरनेट आधारित मोबाइल और टैबलेट लोगों को खबरों के करीब आने में मददगार साबित हो रहे हैं और होंगे। ऐसे में स्पीड न्यूज़ टीवी के दर्शकों के लिए खबरों के मजबूत माध्यम बन सकते हैं, बशर्ते इनका इस्तेमाल और मार्केटिंग सुलझे हुए तरीके से हो।
-          कुमार कौस्तुभ
12.04.2013,  5.13 PM

Thursday, April 11, 2013

खबर – एक कहानी!




पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद पहली बार जब एक अखबार के दफ्तर में ट्रेनी के तौर पर काम करने गया, तो एक वरिष्ठ सहयोगी ने कुछ अंग्रेजी के न्यूज़ आइटम हाथ में पकड़ाते हुए कहा – लीजिए, इससे एक कहानी बना दीजिए। सुनकर अचंभा हुआ कि भला अखबार के न्यूज़ डेस्क पर कहानी का क्या काम? मैं फीचर या साहित्य के पन्ने पर काम करने तो गया नहीं था। साथ ही, पत्रकारिता से पहले साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते कल्पनालोक से जुड़ी कहानी की अलग अवधारणा मन में थी। कथानक, नायक, नायिका, अन्य पात्र, क्लाइमेक्स, सुखद या दुखद अंत- कहानी के ये तमाम तत्व मन में उमड़ने-घुमड़ने लगे। सामने गंभीर चुनौती थी- कभी कहानी तो लिखी नहीं, तो खबरनवीशी में आकर क्या कहानी ही लिखनी होगी। काम की शुरुआत हुई और जब पेशे में उतरा तो कहानी की असली कहानी कुछ इस तरह समझ में आई कि खबरनवीश के लिए हर खबर एक कहानी होती है। हर रिपोर्टर अपनी ‘स्टोरी’ फाइल करता है। न्यूज़ डेस्क के लोग उस ‘स्टोरी’ को छापने या दिखाने लायक बनाने के लिए मांजते हैं। कहना न होगा कि हर खबर की एक कहानी होती है, हर खबर के पीछे कोई न कोई कहानी होती है या फिर यूं भी समझें कि हर खबर एक कहानी कहती है , कई कहानियों का तानाबाना बुनती है।
अखबार के लिए भी खबर एक कहानी होती है और टेलीविजन के लिए भी वो स्टोरी के सिवा कुछ नहीं होती। अखबार के बाद टेलीविजन में काम करने का मौका मिला तो वहां भी कहानी से पीछा नहीं छूटा बल्कि कहानी का और बड़ा फलक सामने आया। कहानी गढ़ने की कला पर साहित्यकार, रचनाकार और आलोचक चाहे कितनी भी माथापच्ची क्यों न कर लें, लेकिन टेलीविजन और समाचार माध्यमों में किस तरह कहानी गढ़ी जाती है उसका राज़ वही लोग जानते हैं जो साहित्य से भी जुड़े हैं और मीडिया से भी। साहित्य में कहानी कला के विकास का इतिहास आपको पढ़ने को मिल जाएगा, लेकिन पत्रकारिता में कहानीकारिता का इतिहास अलिखित है। खासकर टेलीविजन पत्रकारिता में कहानीकारिता का इतिहास लिखना भी बेहद मुश्किल और दुरुह काम है। कभी इस ओर शायह ही किसी पत्रकार का ध्यान गया हो कि न्यूज़ डेस्क पर कहानीकारिता का किस तरह रोज विकास हो रहा है, रोज नए प्रतिमान बन रहे हैं, रोज नई कला सामने आ रही है, रोज नए फॉर्मूले पेश किए जा रहे हैं। फॉर्मूले इसलिए क्योंकि एक बने-बनाए ढर्रे पर, एक खास ढांचे में खबर को मांजकर कहानी बनाने की परंपरा आमतौर पर देखने को मिलती है जिसका सटीक उदाहरण है टेलीविजन स्टोरी की पैकेजिंग। 3 VO  2 बाइट और एक PTC के फ़ॉर्मूले पर टीवी की कहानी लिखने का तरीका  आम हो चला है। हालांकि रोजाना इसमें हर स्क्रिप्ट राइटर अपने मनमुताबिक, या खबर की मांग के मुताबिक बदलाव करता है, कुछ नए एलिमेंट जोड़ता है, कुछ घटाता है और अपनी ड्यूटी निभाता है। टेलीविजन में नौकरी की शुरुआत पर मेरा पाला जब ‘स्टोरी’ लिखने से पड़ा तो मेरे एक तत्कालीन बॉस, जो अब न्यूज़ टेलीविजन की दुनिया के एक बड़े नामों में शुमार हैं, उन्होंने मेरा लिखा देखकर मेरी लंबी चौड़ी क्लास ली। मेरी ही नहीं, वो पूरे चैनल के लिक्खाड़ों की टोली को खबरिया कहानी-कला की बारीकियां बताते थे और उन्हें सही तरीके से स्टोरी लिखने की ताकीद करते रहते थे। इसी क्रम में चैनल में स्क्रिप्ट लेखन की दुनिया के दिग्गज जुगनू शारदेय को भी बुलाया गया था, जो डेस्क के लोगों को लिखना सिखाते थे और समय-समय पर उनका इम्तिहान लेते रहते थे। टीवी कहानीकारिता की इस ट्रेनिंग के दौरान मुझे सबसे पहले ABC  का फॉर्मूला बताया गया और साथ ही ये भी कहा गया कि ये स्टोरी लिखने का आधुनिक तरीका है जो आजतक जैसे चैनलों में इस्तेमाल किया जाता है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान हमें अखबार और टेलीविजन की स्क्रिप्ट लिखने के जो तौर-तरीके बताए गए थे, वो बेकार साबित हो रहे थे। टेलीविजन के नए मुर्गे को बांग देने में मुश्किल आ रही थी। बड़ी तैयारी और पढ़ाई के साथ बुने गए तमाम सपने चकनाचूर होते दिख रहे थे। पढ़ाई के दौरान दूरदर्शन समाचार के तत्कालीन संपादक श्री आलोक देशवाल ने टीवी की खबर लिखने की जो ट्रेनिंग दी थी, बात उससे काफी आगे बढ़ रही थी। किताबों और अन्य स्रोतों से स्क्रिप्ट लिखने की जो सैद्धांतिक समझ पैदा हुई थी, उनकी चर्चा न्यूज़ राइटिंग की किसी भी किताब में मिल सकती है। लेकिन यहां तो व्यावहारिक तरीके से खबर को कहानी में बदलने की चुनौती सामने थी। ऐसे में संपाकद की फजीहत झेलते हुए ABC  का जो फ़ॉर्मूला सामने आया, वो बड़े काम का साबित हुआ। आप सोच रहे होंगे कि खबर की स्क्रिप्ट लिखने का ये ABC  फॉर्मूला क्या है? सीधी सरल भाषा में A का मतलब Action,  B का मतलब खबर का ब्रैकग्राउंडर और C का मतलब Conclusion यानी आगे की ओर इशारा। ये फॉर्मूला तार्किक तौर पर बड़ा सुलझा हुआ लगा और जैसा कि पहले कहा जा चुका है, आधुनिक खबर लेखन के लिहाज से भी फिट बैठता था।
21वीं सदी के शुरुआती दौर में भारतीय टेलीविजन समाचार में जिस तरह के बदलाव आ रहे थे, उनमें और भी नए प्रयोगों की गुंजाइश थी। इसकी बानगियां हमें आगे चलकर देखने को मिलीं। बात बुलेटिन से आगे बढ़ी और खबर विशेष पर स्पेशल शोज़ तक पहुंची तो खबरिया कहानी यानी न्यूज़ स्क्रिप्ट लिखने के मायने और बदले। इसके साथ ही तब से अब तक खबर की तमाम विधाओं – राजनीति, अपराध, खेल, मनोरंजन के क्षेत्रों में भी कहानियों की अपनी मांग के मुताबिक लेखन कला विकसित होती चली गई। खबर का विकास हुआ, कहानी परवान चढ़ी लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में भाषा कहीं पीछे छूटती सी चली गई। दरअसल, निजी समाचार चैनलों में समाचार प्रसारण की बुनियाद में वो भाषा थी, जो साहित्यिक तो कतई नहीं थी, लेकिन सीधी और सरल होने और आम जनमानस की समझ के करीब पहुंचने का दावा करती थी। हार्ड न्यूज में साहित्यिक और लच्छेदार भाषा का प्रवेश निषेध हो चुका था, तर्क ये था कि ये भाषा किताबी है और आम दर्शकों की समझ से बाहर है, लिहाजा कहानी कहने में हमें ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, जो बच्चे से लेकर बूढ़े तक, रिक्शॉवाले से लेकर दफ्तर के साहब तक- सबकी समझ में आए। लिहाजा हिंदी के साथ अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा। ये खबर की कहानी की भाषा का विकास था- लेकिन इस भाषा पर पकड़ रखनेवाले तमाम ऐसे लोग न्यूज़ डेस्क पर आने लगे, जिन्हें न हिंदी ठीक से लिखने आती थी, न उर्दू के शब्दों को देवनागरी में सही-सही लिखने आता था। अंग्रेजी के शब्दों को भी देवनागरी में उतारने का ढर्रा बेखटके चल पड़ा। समझने लायक भाषा सामने लाने की इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान वर्तनी का हुआ और हद तो ये हो गई कि किसी मानक रूप को इस्तेमाल न करने की हठधर्मिता के चलते टीवी के भाषाविदों ने काफी हद तक वर्तनी में सही-गलत बदलाव को भी भाषा के विकास से जोड़कर देखना शुरु कर दिया। ये प्रक्रिया अब भी चल रही है , लेकिन भाषा विमर्श को पीछे छोड़कर खबर की कहानीकारिता पर फिर से बात करें तो मौजूदा दौर में यही बात देखने को मिल रही है कि सिर्फ 10 साल में टेलीविजन समाचार की कहानी का इतना विकास हो चुका है कि अब ABC जैसे फॉर्मूले पीछे छूट गए हैं और कोई निश्चित तरीका नहीं रहा जिस पर टिककर खबर को कहानी का रूप दिया जा सके। समाचार चैनलों की बहुतायत, टीआरपी की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता और बाजारोन्मुख पत्रकारिता ने व्यावहारिक तौर पर ‘प्रोड्यूसर को जो अच्छा लगे, वही कहानी’ का फॉर्मूला अंगीकार कर लिया है। इसी को ध्यान में रखकर किसी भी बुलेटिन या कार्यक्रम की परिकल्पना तय़ होती है और कहानी गढ़ने की वही दिशा होती है, जो शो प्रोड्यूसर पसंद करता है। ऐसे में प्रोड्यूसर के पास अपनी कल्पनाशीलता को रचनात्मक अंजाम तक पहुंचाने की भरपूर गुंजाइश रहती है और कई लोग इस तरीके से काम भी करते हैं, जो अक्सर सराहे जाते हैं। लिहाजा कहना न होगा कि खबर की कहानीकारिता में अब मैदान खुला है और जो जैसा चाहे, वैसा करने की पूरी छूट है, कोई बंदिश नहीं है, सिर्फ ख्याल इसी बात का रखना है कि जो कुछ आप पेश करने जा रहे हैं वो अच्छा लगे। अब सवाल है कि किसको अच्छा लगे- तो जाहिर सी बात है सैद्धांतिक तौर पर आपको अपने दर्शक वर्ग के हितों , उनकी आकांक्षाओं और अपने संगठन के हितों का ख्याल रखना ही होगा। आपको सजग रहकर ये सोचना पड़ेगा कि आपकी कहानी कितनी कसी हुई है और किसी के लिए किसी तरीके से उबाऊ तो नहीं। ये भी ध्यान रखना होगा कि आपने खबर से जुड़े तत्वों को कहानी में समाहित किया है या नहीं। साथ ही सबसे बढ़कर ये भी ध्यान रखना होगा कि क्या आप अपनी कहानी में कहीं कोई बात दोहरा तो नहीं रहे हैं और अगर ऐसा कर रहे हैं, तो क्या उसकी कोई खास जरूरत है और अगर जरूरत है तो दोबारा किसी बात को कहने के लिए आपने क्या नया तरीका इस्तेमाल किया है। ये सब कुछ ऐसे बिंदु हैं, जिनपर टीवी में खबर की कहानी लिखते समय ध्यान दिया जाए तो न सिर्फ आपको आत्मिक संतोष मिलेगा , बल्कि आपका प्रॉडक्ट भी बेहतर बनेगा।
ये तो खबर की कहानी लिखने की कहानी हुई, अब जरा खबर की कहानी के एक दूसरे पहलू पर गौर कर लें, जो खबर के लिहाज से काफी अहम है। सैद्धांतिक तौर पर खबर की जो भी परिभाषाएं हों, उनकी गहराई में नहीं जाना चाहता, लेकिन व्यावहारिक तौर पर एक बात कई बार देखने को मिलती है कि खबर को खबर बनाने में कहानी का अहम योगदान होता है। यानी खबर के पीछे छुपी कहानी को उभारने के लिए रिपोर्टर क्या क्या करता है और स्क्रिप्ट राइटर घटनाक्रम को किस तरह कहानी के ढांचे में ढालता है। मसलन चोरी और लूटपाट की हर घटना खबर हो भी सकती है और नहीं भी। लेकिन अगर खबर एक ऐसी महिला के साथ लूटपाट और हत्या की हो , जो हाईप्रोफाइल हो, हमेशा सोने के गहनों से लदी रहती हो, तो उसके बारे में एक खबर कई कहानियों को जन्म दे सकती है। इसके लिए जरूरी है रिपोर्टर की ओर से वो तमाम तथ्य और जानकारियां जुटाई जाएं, जो कहानी के प्लॉट को तैयार करती हैं और उसे विकसित करती हैं। खबर बनाने के पीछे भी कई बार कहानी होती है। मसलन आपको य़ाद होगा किसी इलाके में मीडिया पर एक आदमी को आत्मदाह के लिए उकसाने का आरोप लगा ताकि सिर्फ एक खबर बन सके। जाहिर है, समाज में खबरों के पीछे की ऐसी कहानियां कई बड़े सवाल छोड़ जाती हैं और टेलीविजन मीडिया को भी कठघरे में खड़ी करती हैं। ऐसे में, जरूरत इस बात की है कि हम खबर से कहानी जरूर बनाएं, लेकिन खबर के लिए कोई कहानी कतई न बनाएं।
-कुमार कौस्तुभ
11.04.2013, 4.20 PM

Wednesday, April 10, 2013

TV पर अपराध




‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’
‘सन्नाटे को चीरती सनसनी सन्न कर देती है इंसान को’
‘वारदात’ में आपका स्वागत है- ये कुछ ऐसी लाइन्स हैं जो हिंदी न्यूज़ टेलीविजन के दर्शकों के दिलो-दिमाग पर बरसों से छा चुकी हैं। ये टैगलाइन्स हैं टेलीविजन के समाचार चैनलों पर प्रसारित होनेवाले क्राइम शोज़ के। 21वीं सदी की शुरुआत के साथ ही भारत में निजी समाचार चैनलों का जो उत्थान शुरु हुआ, उसमें खांटी समाचार के प्रसारण के साथ-साथ कई विधाएं जुड़ती चली गईं। इसी कड़ी में सुन 2002 के बाद तमाम हिंदी न्यूज़ चैनलों पर अपराध आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई। तकरीबन हर समाचार चैनल पर एक न एक स्लॉट क्राइम शो के नाम कर दिया गया। खासकर रात 11 बजे का स्लॉट जब प्राइम टाइम खत्म हो रहा होता है और सुबह नॉन प्राइम टाइम के स्लॉट रात वाले शो को रिपीट करने के लिए तय रखे गए। ज़ी न्यूज़ के क्राइम शो क्राइम रिपोर्टर, तत्कालीन स्टार न्यूज़ के शो सनसनी, आजतक के वारदात, जुर्म, हत्यारा कौन, और एसीपी अर्जुन जैसे कार्यक्रमों के अलावा अन्य चैनलों के डायल 100, पर्दाफाश जैसे अपराध समाचारों पर आधारित कार्यक्रमों ने टेलीविजन समाचारों के दर्शकों के बीच अच्छी पकड़ बना ली। शाय़द यही वजह थी कि सरकारी समाचार चैनल दूरदर्शन न्यूज़ भी अपराध के मायाजाल से खुद को अलग नहीं रख सका और DD पर भी रंगे हाथ जैसे क्राइम शो प्रसारित होने लगे। जाहिर है क्राइम शो TRP  यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स के मनोविज्ञान की उपज थे, लिहाजा ये काफी परवान चढ़ और शुरुआत के बाद से तकरीबन 10 साल गुजर जाने के बाद भी ज्यादातर समाचार चैनलों पर इनका जलवा कायम है और 24 घंटे के FPC में इनकी खास जगह अब भी बरकरार है। हालांकि एनडीटीवी इंडिय़ा और आईबीएन7 जैसे कुछ चुनिंदा न्य़ूज़ चैनलों का क्राइम शो से मोहभंग भी हुआ या यूं कहें कि खुद को कुछ अलग दिखाने की होड़ में कई चैनलों ने क्राइम शो को नमस्कार कर लिय़ा और उनका प्रसारण बंद भी कर दिया। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अपराध से जुड़े समाचार टीवी चैनलों से गायब हो गए। समाज में अपराध होते हैं लिहाजा समाचार चैनलों के बुलेटिन से लेकर प्रोग्रामिंग तक का अहम हिस्सा ये समाचार रहते ही हैं। लेकिन समाचार चैनलों पर समाचार से इतर अपराध को अहमियत देने की आखिर क्या वजहें हैं। टेलीविजन मीडिय़ा के विश्लेषक इस मुद्दे पर काफी चर्चाएं आए दिन करते रहते हैं और इसके पक्ष-विपक्ष काफी बातें सामने आती रहती हैं। इस सिलसिले में यहां कुछ बिंदुओं और कुछ सवालों पर चर्चा जरूरी समझता हूं।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब अपराध से जुड़े मामले समाचार की श्रेणी में आते हैं, तो इन्हें बुलेटिन में जगह देने के अलावा अलग से इनके लिए खास कार्यक्रम की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? इसके पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि रोजाना अपराध से जुड़ी खबरों की आवक इतनी ज्यादा होती है कि इनके लिए एक पूरा बुलेटिन भी छोटा पड़ जाए। लिहाजा शुरुआती दौर में क्राइम रिपोर्टर जैसे बुलेटिन में अपराध से जुड़ी तमाम बड़ी खबरों को समाहित करने की दिशा में काम शुरु हुआ। रात के 11 और साढ़े 11 बजे के स्लॉट्स में प्रसारित होने वाले इस तरह के बुलेटिन का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग निम्न और मध्यम कामकाजी वर्ग हुआ करता था और मेरी समझ में आज भी वही इसका सबसे बड़ा दर्शक वर्ग है। गुजरते वक्त के साथ बुलेटिन की परिकल्पना और प्रस्तुति में भी बदलाव आया और इस तरह के क्राइम बुलेटिन्स ने क्राइम शो का रूप ले लिया, जिनमें किसी एक या दो बड़ी अपराध कथाओं के तमाम पहलुओं का तानाबाना बुनने की कोशिश शुरु हुई। आज के दौर में आम तौर पर क्राइम शो किसी एक अपराध कथा पर ही केंद्रित होते हैं। एक बुलेटिन में 10 कहानियों की जगह , कैमरा हर दिन किसी एक बड़े आपराधिक मामले के इर्द-गिर्द ही घूमने लगा है। हर दिन प्रस्तुति अलग किस्म की होती है। नए किस्म की नाटकीयता होती है। अपराध का पोस्टमॉर्टम करने के लिए सीधी सपाट खबरिया स्टोरी की जगह अब खास ट्रीटमेंट वाली स्क्रिप्ट , स्पेशल इफेक्ट्स, ग्राफिक्स, एनिमेशन और यहां तक कि अपराध-विशेष के रिक्रिएशन तक का इस्तेमाल करके स्टोरीज़ तैयार की जाती हैं। मकसद आमतौर पर यही होता है कि दर्शक को खबर के ज्यादा से ज्यादा करीब ले जाया जा सके, उसे सोचने को मजबूर किया जा सके, उसे कमिंग अप के बाद की स्टोरी देखने के लिए बांधा जा सके, उसमें खबर की तह तक जाने का कौतूहल पैदा हो । लेकिन दूसरे पहलू को देखें, तो ये किसी न किसी रूप में खबर से बढ़कर मनोरंजन का एक जरिय़ा है जिसमें रहस्य-रोमांच से लेकर मिर्च-मसाला तक वो सब कुछ होता है, जो किसी मुंबइया थ्रिलर में देख सकते हैं। प्रस्तुति का तरीका थोड़ा हट कर होता है, लिहाजा वो टेलीविजन का क्राइम शो होता है, फिल्म नहीं होती। लेकिन इसके जरिए इस पेशे से जुड़े लोगों को अपनी क्रिएटिविटी दिखाने की तमाम दमित इच्छाएं काफी हद तक पूरी होती हैं या फिर दूसरे तरीके से देखें, तो वो अपने दायित्व का हरसंभव निर्वहन करने की कोशिश करते हैं।
क्राइम बुलेटिन से क्राइम शो तक के सफर की चर्चा हो रही है तो हिंदी एंटरटेनमेंट टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित होनेवाले क्राइम शोज़ को भी भुलाया नहीं जा सकता। सीआईडी, क्राइम पैट्रोल, सावधान इंडिया- ये कई ऐसे कार्यक्रम हैं, जो अपराध की खबरों से ही ताल्लुक रखते हैं- कल्पना कम और खबरों से ही ज्यादा प्रेरित होकर इन कार्यक्रमों के एपिसोड तैयार किए जाते हैं। ऐसे में सवाल ये है कि अपराध आधारित मनोरंजन जब एंटरटेनमेंट शो पर मिल रहा है, तो समाचार चैनलों पर इनकी जरूरत क्यों? इसका जवाब ये है कि समाचार चैनलों पर प्रसारित होने वाले क्राइम शो में तात्कालिकता होती है- हाल-फिलहाल की खबर का विश्लेषण होता है और नाटकीयता के जरिए मनोरंजन का तड़का भी, लिहाजा अपराधों में दिलचस्पी रखनेवाले दर्शकों के लिए ये ज्यादा सहज तरीके से उपलब्ध समाचार आधारित मनोरंजन की खिचड़ी है। एंटरटेनमेंट चैनलों पर प्रसारित होनेवाले शोज़ का मकसद अलग है और समाचार चैनलों पर प्रसारण का मकसद अलग। समाचार चैनल समाचार से दूर नहीं हो सकते, भले ही कितनी भी नाटकीयता का पुट कार्यक्रमों में क्यों न डाला जाए, लेकिन USP खबर होने की वजह से खबर से हटकर कार्यक्रम का ढांचा और कलेवर पेश करना मूल मानसिकता को खत्म करने की ओर बढ़ना होगा। इसके पीछे कुछ तो NBA जैसे संगठनों की ओर से तैयार की गई आत्मसंयम की कठोर नीतियां भी हैं, जो समाचार चैनलों को सीमा से बाहर नहीं जाने देतीं, तो काफी हद तक बजटीय आर्थिक सीमाएं भी जो कम से कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा बेहतर प्रॉडक्ट देने के लिए चैनलों के नियंताओं को मजबूर कर देती हैं। ऐसे में समाचारीय तात्कालिकता के दायरे में रहते हुए अपनी कल्पनाशीलता और क्रिएटिव क्षमता का इस्तेमाल करते हुए समाचार चैनलों के स्वनामधन्य पत्रकार, प्रोड्यूसर 4 से 5 पैकेज तैयार करके हर रोज एक नया कार्यक्रम पेश करने की ड्यूटी निभाते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं। अपराध समाचारों के साथ पूरा इंसाफ करने की कोशिश में क्राइम डेस्क का पूरा अमला जुटा होता है और शो ऑन एयर होने पर लोग चैन की सांस लेते हैं।

यहां तक बात अपराध समाचारों के शो तक के सफर के बारे में हुई और अब जरा विचार करें कि टेलीविजन पर बुलेटिन से लेकर खास स्लॉट आधारित कार्यक्रमों तक में अपराध समाचारों को जितना और जिस तरह दिखाया जाता है, इसका आम दर्शक और समाज पर भला असर क्य़ा पड़ता है। आज के दौर में चोरी-डकैती से ज्यादा बलात्कार और छेड़खानी के समाचार आम हो गए हैं। रेप शब्द तो जैसे समाचार चैनलों की खबर पट्टियों से हटता ही नहीं- ऐसे में जाहिरा तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर आपके साथ आपका छोटा बच्चा टीवी समाचार देख रहा हो, तो वो भी य़े जरूर पूछ सकता है कि पापा, ये रेप-वेप क्य़ा होता है। भारतीय मध्यवर्गीय समाज की पारिवारिक संरचना में इस सवाल का जवाब देना किसी के लिए भी दुष्कर हो सकता है। लेकिन जिस तरह टेलीविजन पर सैनिटरी नैपकिन या कंडोम के एड देखकर बच्चे सवाल नहीं पूछते और ये सबके लिए सर्वग्राह्य हो चुके हैं, लगता है काफी हद तक वैसे ही रेप और छेड़खानी जैसे जुमले भी सबकी समझदारी में बैठ और पैठ गए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सैनिटरी नैपकिन या कंडोम के एड प्रसारित करने का मकसद लोगों को इनके बारे में शिक्षित करना भी है, इनकी जरूरत के बारे में सजग करना भी है, लेकिन अपराध-जनित समाचारों में जो जुमले , जो शब्द अक्सर देखने में आते हैं, वो किस हद तक शिक्षित कर सकते हैं नहीं, पता, लेकिन एक भय का माहौल जरूर पैदा कर देते हैं। याद आता है फिल्म शोले पर आधारित वो चुटकुला, जिसमें मां रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए कहती है- सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा। कहीं, हमारे समाचार चैनलों के समाचार हमारे लिए ऐसा माहौल तो नहीं बना रहे कि बच्चों को कहना पड़े- घर से नहीं निकलना, कुछ भी हो सकता है। भारत में टीवी के समाचार चैनलों की अवधारणा और खासकर उन पर क्राइम बुलेटिन और क्राइम शो पेश करने की विचारधारा पश्चिम से आय़ातित है। अमेरिका जैसे देशों में इसका कैसा असर है, इस पर विमर्श करते हुए Journal of Communication के  March 2003 अंक के पेज नंबर 88 पर Daniel Romer, Kathleen Hall Jamieson  और  Sean Aday ने Television News and the Cultivation of Fear of Crime शीर्षक लेख में लिखा है-

“Why has the public persisted in believing that violent crime is a widespread na-
tional problem in the U.S. despite declining trends in crime and the fact that crime
is concentrated in urban locations? Cultivation theory suggests that widespread
fear of crime is fueled in part by heavy exposure to violent dramatic programming
on prime-time television. Here we explore a related hypothesis: that fear of crime is
in part a by-product of exposure to crime-saturated local television news. To test
this, as well as related and competing hypotheses, we analyzed the results of a
recent national survey of perceived risk; a 5-year span of the General Social Survey
(1990–1994); and the results of a recent survey of over 2,300 Philadelphia resi-
dents. The results indicate that across a wide spectrum of the population and inde-
pendent of local crime rates, viewing local television news is related to increased
fear of and concern about crime. These results support cultivation theory’s pre-
dicted effects of television on the public.”[1]


जाहिर है, अमेरिकी समाज के बारे में Daniel Romer, Kathleen Hall Jamieson  और  Sean Aday का अध्ययन अलग हो सकता है, लेकिन एक बात और ध्यान देने की है कि भारत और अमेरिका दुनिया के बड़े लोकतंत्र हैं, पूंजीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। अमेरिका विकसित देशों की श्रेणी में है औऱ भारत विकासशील – लिहाजा आम आदमी अमेरिका को हर मामले में आदर्श के रूप में देखता है , अमेरिकी ढर्रे से प्रभावित भी होता है तो Cultivation theory का जो नतीजा अमेरिका के लिए है, क्या वो भारत पर लागू नहीं हो सकता। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में राय हो सकती है- अपने-अपने अलग-अलग विचार हो सकते हैं, ये गहन विमर्श का विषय है। अमेरिका के ही एक और अध्ययन को देखें तो ये बात साफ हो जाती है कि टेलीविजन, अपराध और इंसाफ का कितना गहरा संबंध है। Connie L. McNeely ने अपने लेख PERCEPTIONS OF THE CRIMINAL JUSTICE SYSTEM: Television Imagery and Public Knowledge in the United States में लिखा है-
‘While certainly there are other sources of information, research has suggested that a majority of people in the United States receive much of their impressions and knowledge of the criminal justice system through the media, in particular through entertainment television viewing (Surette 1992). Indeed, in some ways, the most direct "contact" that most persons have with the criminal justice system is through the "television experience." This point is very much in keeping with depictions of increasingly "postmodern" life in which the authority of the family and school has greatly waned (Saney 1986), and television is progressively the principal means of (or replacement for) "social contact" and socialization (Giddens 1981; Laywood 1985). Furthermore, research on television as an agent of socialization and source of knowledge and information has indeed been very suggestive along these lines, for both children and adults (Gerbner and Gross 1976a, 1976b; Altheide 1985; Roberts and Doob 1990; Drucker 1989).’[2]
McNeely का विचार काफी हद तक सही लगता है। खासकर अगर हम अपने देश में अपराध समाचारों की ऐसी कवरेज पर ध्यान दें, जिसे ‘मीडिया ट्रायल’ कहा जाता है, तो साफ हो जाता है कि कहीं न कहीं सही या गलत का सिद्धांत तय करने में मीडिया या यूं कहें कि टेलिविजन का खासा योगदान रहता है। ऐसे आरोप भी अक्सर लगते हैं और किसी भी मामले को गति देने में टेलीविजन कवरेज की भूमिका से इंकार भी नहीं किया जा सकता। भले ही इसके अच्छे और बुरे – दोनों ही पहलू हैं, जिनका ध्यान अपराध समाचारों की कवरेज से लेकर उन्हें स्पेशल शो के दायरे में लाने तक रखा जाना चाहिए। न्यूज़ टेलीविजन का काम समाचार देना है, और अपनी इस भूमिका से वो अलग नहीं हो सकते । अपराध भी समाचार का हिस्सा ही हैं ये बात दोहराते हुए एक बार फिर यही कहना पड़ता है कि कहीं टेलीविजन समाचार चैनल अपने मूल उद्देश्य से भटक तो नहीं रहे। सीमा का उल्लंघन भी अपराध की श्रेणी में आता है, ऐसे में TV पर अपराध न हो, इसका ख्याल जरूर रखा जाना चाहिए।
-          कुमार कौस्तुभ
10.04.2013, 18.23 PM


[1] http://www-rohan.sdsu.edu/~digger/305/crime_cultivation_theory.pdf