Thursday, April 25, 2013

फ्लैश न्यूज़..फ्लैश क्रिकेट ..और न्यूज़ चैनल




      अप्रैल 2013..क्रिकेट के IPL सीज़न 6 के मुकाबले जारी हैं..समाचार चैनलों पर खेलों के बुलेटिन IPL -6 की खबरों से भरे पड़े हैं ..वहीं एक समाचार चैनल राजधानी दिल्ली के गली-मुहल्ले में लोगों की क्रिकेट के प्रति दीवानगी को दिखा रहा है..इस रूप में नहीं कि क्रिकेट के फैंस IPL मुकाबलों या अपने चहेते खिलाड़ियों और टीमों के बारे में कुछ कहते दिखें, उनकी जीत का जश्न और हार का मातम मनाते दिखें..यहां तो क्रिकेट के दीवाने खुद छोटे पर्दे पर चौक-छक्के लगाते दिख रहे हैं। ये दिल्ली एनसीआर के चैनल दिल्ली आजतक की खास पेशकश है। IPL टीम दिल्ली डेयरडेविल्स के साथ मिलकर दिल्ली आजतक ने दिल्ली के गली-मुहल्लों और पार्कों में खेले जानेवाले क्रिकेट को करंट अफेयर्स कार्यक्रम के दायरे में ला दिया है। सवाल है कि आखिर मकसद क्या है इस मुहिम का...क्या खबरों का टोटा पड़ गया, जो इस तरह की स्टोरीज़ समाचार आधारित चैनल पर चल रही हैं? कुछ लोगों का मानना है कि इससे बढ़िया तो IPL के बुलेटिन ही दिखा देते। लेकिन नहीं, दिल्ली आजतक दिल्ली-NCR का चैनल है, दिल्ली-NCR से जुड़ी चैनल की पहचान है और दिल्लीवालों से जुड़ी हर खबर दिखाना इसका मकसद है और सभी जानते हैं कि क्रिकेट भले ही खेल है, लेकिन खबरों के दायरे में तो आता ही है, तो अगर दिल्लीवालों की दिलचस्पी इस खेल को खेलने में दिख रही है, तो ये दिल्ली आजतक के लिए भला क्यों न खबर हो? बात वाजिब है, खबर की खबर, खेल का खेल और मनोरंजन का मनोरंजन हो रहा है फ्लैश क्रिकेट की इस खास मुहिम के जरिए। एक बात और है, जिस पर आम तौर पर ध्यान नहीं जाता। एक तरफ यहां खेल और दिल्ली वालों की खबर दिखाने का मकसद पूरा हो रहा है, तो दूसरी तरफ दर्शकों को चैनल से जोड़ने की ये एक इंटरैक्टिव मुहिम भी तो है। आखिर दिल्लीवाले दुनियाभर की खबरों की कवरेज चैनलों पर देखते हैं, तो क्या उन्हें खुद खबरों में आने की चाहत नहीं होती, वो भी पॉजिटिव और मनोरंजक तरीके से? बिल्कुल होगी और यही मौका लोगों को दिल्ली आजतक दे रहा है। लोगों को क्रिकेट खेलने और खेल के प्रति अपनी दीवानगी के इजहार का मौका मिलता है और उसकी कवरेज चैनल पर होती है..लोगों को बाद में उसका प्रसारण भी देखने को मिलता है- किसी के चौके-छक्के दिखते हैं, तो किसी की बाइट दिखती है...यानी कुल मिलाकर लोगों के लिए खुद के टीवी पर दिखने का ये एक शानदार और यादगार मौका बन जाता है, जिसका फायदा उठाना हर आम दिल्लीवाला चाहेगा। जाहिर है, लोगों की इस भावना का फायदा चैनल को भी मिलता है और उसके दर्शकों की संख्या में बढ़ोतरी तो हो ही जाती है, कम से कम जिस दिन जिस इलाके के फ्लैश क्रिकेट मैच की कवरेज होती है, उस दिन वहां के पनवाड़ी से लेकर सेठ जी तक, बाबू साहब से लेकर मोहन ढाबेवाले तक...कॉलेज में पढ़नेवाले बंटी-बबली से लेकर उनके भैया-भाभियों, चाचे-चाचियों और दादी-नानियों तक जो दूसरे इलाकों में भी रहते हैं, सभी टीवी पर नजरें गड़ाए रहते हैं ताकि अपने लोगों की झलक चंद सेकेंड के लिए ही सही पर्दे पर देख सकें। इस तरह आम दर्शकों से जुड़ने और उन्हें चैनल से जोड़ने की ये मुहिम टीआरपी की होड़ में भी काफी कामयाब साबित हो सकती है, इसका पूरा भरोसा चैनल की मार्केटिंग टीम को तो होगा ही। साथ ही दिल्ली डेयरडेविल्स टीम जैसे इसके जो प्रायोजक और सहयोगी भी अपना फायदा देखते हैं क्योंकि लोगों के बीच उनका भी प्रचार इसके जरिए होता है। अगर चैनल को प्रायोजक से आर्थिक फायदा हो रहा है, तो वो भी एक अतिरिक्त रिवार्ड प्वाइंट है, क्योंकि स्टोरी कवरेज तो चैनल वैसे भी करते हैं, इस कार्यक्रम की स्टोरीज़ को एक मुहिम से जोड़ दिया गया है। कुछ बड़े स्तर पर देखें, तो एनडीटीवी का यूनिवसिर्टी क्रिकेट लीग औऱ ग्रीनेथॉन और एबीपी पर बेस्ट सिटी अवॉर्ड्स जैसी मुहिम भी आम लोगों को चैनल से जोड़ने और चैनल के लिए विज्ञापन रेवेन्यू जुटाने का असरदार जरिया साबित होती रही हैं। कई चैनलों पर आनेवाले पर्सन ऑफ द इयर और एचीवमेंट अवॉर्ड्स जैसे कार्यक्रम भी ऐसी ही मुहिम की श्रेणी में आ सकते हैं, जिनका मकसद चैनल का प्रचार करना ज्यादा ही दिखता है।
      समाचार चैनलों की दुनिया में फ्लैश क्रिकेट, यूसीएल, ग्रीनेथॉन जैसे कार्यक्रमों के प्रसारण चैनलों को दर्शकों से जुड़ने और उन्हें चैनल से जोड़ने की नई शुरुआत नहीं हैं। इससे पहले भी तमाम मौके ऐसे आए हैं, जब समाचार चैनलों की मार्केटिंग के लिए इस तरह की मुहिम का सहारा लिया गया हो, चाहे वो सीरियस घटनाएं रही हों, या फिर सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दे, जिनके लिए मुहिम खड़ी करके एक तरफ जहां समाचार चैनलों को खुद को सरकारों से जुड़े दिखाने का मौका मिलता है, वहीं चैनल की अच्छी-खासी पब्लिसिटी भी होती है। चाहे मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के बाद की आतंकवाद के खिलाफ जंग छेड़ने की मुहिम हो, या फिर ‘दामिनी’ और ‘गुड़िया’  को इंसाफ दिलाने की मुहिम- इनकी प्रस्तुति अलग-अलग तरीके से हो सकती है, कहीं बड़े स्तर पर, तो कहीं छोटे स्तर पर- भीड़ जमा करके या फिर सिर्फ मुद्दे पर खबरिया पहलुओं से जुड़ी स्टोरीज़ दिखा करके चैनल अपनी मुहिम को धार देते हैं। लेकिन इनका मूल उद्देश्य साफ है और इसके अलग-अलग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू हैं। एक तरह से देखा जाए तो ये समाचार चैनलों की सामाजिक भूमिका पर सवाल उठाने वाली बात हो गई। आप कहेंगे कि समाचार चैनल अगर मुहिम के रूप में किसी मुद्दे को न उठाएं तो वो दब भी सकता है और उस पीड़ा, उस जुल्म को भुला दिया जा सकता है, जिसके लिए समाज में मुहिम खड़ी करने की जरूरत होती है। समाचार चैनल चाहे जिस तरह से भी हो मुद्दों को उठाते हैं, उन पर चर्चा जारी रखते हैं, तभी तो जागरुकता बढ़ती है और जरूरी कार्रवाइयां होती हैं, जिन्हें ‘खबर का असर’ कहा जाता है और तमाम चैनल उसका क्रेडिट लेना भी नहीं भूलते। ये ‘नेकी कर दरिया में डाल’ वाली स्थिति कतई नहीं है। मुद्दे को पब्लिक भले ही दो दिन में भूल जाए, लेकिन अगर महीनों बाद उस पर कोई कार्रवाई हुई, तो चैनल उसे अपनी जीत बताते नहीं थकते। मकसद ये बताना है कि तमाम मुद्दों को सड़क तक उतारने की मुहिम खड़ी करने में चैनलों का फायदा ही है, कोई नुकसान नहीं और अगर इन मुहिम को प्रायोजक मिल गए, तो बल्ले-बल्ले यानी और भी खर्चों की कोई चिंता नहीं। तो एक तो मुहिम शुरु करने से दर्शक चैनल से जुड़ते हैं, लोग तारीफ भी करते हैं कि अमुक चैनल ने अमुक मुद्दे को कितने जोरशोर से उठाया और अगर उस पर सार्थक कार्रवाई होती है, तो पीड़ित को भी फायदा होता है। प्रायोजक मिलने से पैसे भी मिलते हैं यानी चैनल की मार्केटिंग भी हो जाती है। यहां एक पहलू और भी महत्वपूर्ण है, वो ये कि जब किसी समाचार चैनल की ओर से किसी भी मुद्दे पर कोई कैंपेन या कोई मुहिम छेड़ी जाती है, तो आखिर चैनल पर प्रसारण के लिए उसे कितना वक्त दिया जाता है?  आमतौर पर देखा जाता है कि आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बड़े कार्यक्रम, रैलियों, कैंडल मार्च, शपथ जैसी कई घंटे की तैयारी हो, तो एक दिन के प्राइम टाइम स्लॉट में कई घंटे उसके सीधे प्रसारण पर खर्च कर दिए जाते हैं और अगले दिन उसके संपादित हिस्से भी कम से कम घंटे-दो घंटे रिपीट तो हो ही जाते हैं। इसके अलावा मुहिम अलग-अलग शहरों पर केंद्रित है, तो बड़े शहरों की बड़ी कवरेज और लाइव प्रसारण के लिए भी कई घंटों के स्लॉट तय करने पड़ते हैं। तीसरा तरीका है स्टोरी कवरेज का, यानी हफ्ते-दस दिन या महीने भर तक या जब तक मुद्दा ठंडा न पड़ जाए, तब चलने वाली मुहिम से जुड़ा हो, तो आधे घंटे का बुलेटिन या फिर बुलेटिन का एक हिस्सा ही उक्त मुद्दे के नाम कर दिया जाता है और मुहिम लंबे समय तक अपनी खास ब्रांडिंग के साथ चलती रहती है। इसमें शुरुआती दो तरीकों के जरिए पब्लिक को चैनल से जोड़ने और चैनल की पब्लिसिटी में काफी सुविधा होती है। कार्यक्रम बड़े स्तर के होते हैं, तो बड़ी संख्या में लोग जुड़ते हैं, जानी-मानी हस्तियां भी आती हैं और मुद्दे के साथ साथ चैनल की पहल की भी जय-जय होती है। तीसरा तरीका मुद्दे से ज्यादा जुड़ा है और अगर खबर मजबूत है, तो चैनल को उसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है। इस तरीके से कई बार चैनल अपनी जरूरत और अपने फायदे के मुद्दों पर भी कवरेज करते हैं, मसलन 2003 से 2005 के बीच ज़ी न्यूज़ चैनल पर दो ऐसे मुद्दों पर लंबे समय तक मुहिम चली जिनका सरोकार सामाजिक भी था और लोगों की दिलचस्पी के भी विषय मुद्दे के तौर पर उठाए गए थे। 2004 का एक अहम मुद्दा  था पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ‘गुड़िया’ नाम की महिला का, जिसे दो लोग अपनी पत्नी बनाने का हक जता रहे थे, पहला पति फौज में था और लड़ाई के दौरान उसके मारे जाने की खबर आई थी, जिसके बाद दूसरे शख्स के साथ उसका निकाह पढ़वा दिया गया, लेकिन पहला पति भी सलामत लौट आया तो सवाल उठ खड़ा हुआ कि आखिर ‘किसकी गुड़िया?’ वो किसके साथ जिंदगी गुजारेगी ..तमाम पंचायतों से होते हुए ये मुद्दा न्यूज़ चैनल तक पहुंचा और चैनल ने भी इस पर लाइव पंचायत बिठा दी। लेकिन न्यूज चैनल अदालत या पंचायत तो हो नहीं सकते लिहाजा लंबे समय तक चली मुहिम का अंत छोटे पर्दे के एक शानदार ड्रामे के रूप में हुआ। ‘गुड़िया’ आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी को समाचार चैनल ने जिस तरीके से उठाया, उसके भले ही अच्छे-बुरे जो भी पहलू हों, लेकिन उसे भारतीय समाचार चैनलों के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। ज़ी न्यूज़ पर ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ही एक और लड़की ‘मुंजरिन’ की स्टोरी लंबे समय तक कवर होती रही, क्योंकि उसे कोई रहस्यमय बीमारी थी। चैनल की ओऱ से स्टोरी को उठाने पर भी उसके रहस्य का कोई खास नतीजा निकला हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता और ये मुहिम अचानक ही खत्म भी हो गई, आज ‘मुंजरिन’ किस हालत में है, ये कोई नहीं जानता लेकिन ये बात जरूर रही कि मुद्दा इतना दिलचस्प था कि उसकी स्टोरीज़ का और उस पर कार्यक्रमों का प्रसारण लंबे समय तक चलता रहा। समाचार चैनलों के साथ आजकल दिक्कत ये भी है कि कोई मुद्दा उठाया जाता है, लेकिन उसे लंबे समय तक फॉलो कर पाना संभव नहीं होता। ऐसे में कई बार जोर-शोर से उठाए गए मुद्दे बेनतीजा खत्म हो जाते हैं। हालांकि ऐसा भी देखने में आया है कि जेसिका लाल हत्याकांड और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड जैसे मुद्दे टेलीविजन पर बार-बार मरकर जिंदा होते रहे, जिसकी वजह से उनके मुकदमे अंजाम तक पहुंच गए। आजकल सोशल मीडिया का उत्थान हो रहा है, लेकिन टेलीविजन के समाचार चैनल किसी भी मुद्दे को उठाने के लिए अब भी सबसे सशक्त माध्यम बने हुए हैं, क्योंकि इनके जरिए मुद्दे के हर पहलू का विस्तार से विश्लेषण होता है और घंटे दर घंटे खबर से लेकर बहस-मुसाहिबों तक मुद्दा जिंदा रहता है और दर्शक भी उससे जुड़े रहते हैं क्योंकि देश-दुनिया तक समाचार चैनलों का इतना विस्तार हो चुका है कि सुदूर इलाकों के लोग भी उनसे जुड़े रह सकते हैं। इस मायने में इंटरनेट और सोशल मीडिया की पहुंच कुछ कम है क्योंकि कम से कम भारत में तो फिलहाल वो सिर्फ पढ़े-लिखे और तथाकथित ‘इलीट’ समुदाय के ही इस्तेमाल में है। ऐसे में समाचार चैनलों को उन दर्शकों से भी जुड़ने का मौका मिलता है, जो भले ही पढ़े-लिखे और चैनलों की भाषा में उन पर अपनी बातें रखने में नहीं सक्षम हों, लेकिन खबर देखने में दिलचस्पी रखते और जाहिरा तौर पर उसका कुछ असर तो उनके दिलो-दिमाग पर तो होता ही होगा। और इसी असर का फायदा न्यूज़ चैनलों को होता है क्योंकि दर्शकों को जिन चैनलों पर खबरों का सेलेक्शन और प्रस्तुति अच्छे लगते हैं, वो उन्हें देखना पसंद करते हैं। तो यूं कहें कि मुद्दों को उठाकर उनसे खेलने वाले समाचार चैनल दोनों ही तरह से फायदे में रहते हैं, एक तरफ तो विलुप्त हो चुकी मिशन पत्रकारिता का अक्स इनकी मुहिम में दिखता है, तो दूसरी तरफ कारोबार की कला भी झलकती है। जरूरत है थोड़ा ईमानदार होने की और मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता को मुहिम में बदलने की तैयारी सोच-समझकर करने की ताकि पहल सार्थक हो और उनका दूरगामी नतीजा निकले, न कि हफ्ते-दस दिन बाद चैनल भी मुद्दे को भूल जाएं और दर्शक भी।
-कुमार कौस्तुभ
25.04.2013, 5.10 PM

संपादक- सामर्थ्य और सीमा




                संपादक अब मीडिया संस्थानों में मजह एक पदनाम नहीं रहा, वरन ये एक पूरी व्यवस्था को इंगित करता है। आमतौर पर संपादक से मतलब उस व्यक्ति से होता है, जो अखबार, रेडियो या टेलीविजन पर पेश और प्रसारित किए जानेवाले कंटेट के लिए जिम्मेदार हो। संपादकी के काम की मूल भावना यही है, लेकिन आधुनिक दौर में संपादकों की जिम्मेदारियां काफी बढ़ गई हैं, लिहाजा कार्यक्षेत्र का विस्तार हो गया है और इसी क्रम में इस पदनाम से जुड़े और इसके कई और पर्यायवाची पदनाम पैदा हो गए हैं। संपादक किसी मीडिया संस्थान में मालिक य़ा प्रमोटर की हैसियत वाला व्यक्ति हो सकता है या फिर मालिक या प्रमोटर के बाद दूसरे या तीसरे नंबर पर उसकी हैसियत होती है। आजकल मीडिया संगठनों का कॉरपोरेटीकरण हो चुका है, लिहाजा मालिक के बाद चीफ एग्जेक्यूटिव ऑफिसर और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर जैसे पद भी होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी संगठन का प्रबंधन देखना होती है। लेकिन चैनल या अखबार या किसी और समाचार संगठन में प्रसारित होनेवाले कंटेट का जिम्मा संपादक कहलानेवाले व्यक्ति पर ही होता है।
बहरहाल बात संपादक की सामर्थ्य और सीमा की हो रही है, तो सबसे पहले ये साफ कर देना जरूरी है कि यहां चर्चा उन संपादकों की हो रही है, जिन पर समाचार चैनलों को चलाने का उत्तरदायित्व होता है यानी मैनेजिंग एडिटर, एग्जेक्यूटिव एडिटर, सीनियर एडिटर और एडिटर या फिर सीनियर एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर, एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदनामों वाले लोग जो चैनल के कंटेंट और प्रबंधन का काम देखते हैं। किसी एक समाचार चैनल के प्रमुख या कई चैनलों के प्रमुख के तौर पर मैनेजिंग एडिटर या एडिटर इन चीफ सबसे वरिष्ठ व्यक्ति होते हैं, जरूरी नहीं कि वो उम्रदराज भी हों, लेकिन चैनल के सभी विभागों की कमान संभालते हैं और उनका काम संपादकीय और प्रसारण से जुड़ी संगठन की नीतियां तय करना है और ये ध्यान रखना है कि नियामक संगठनों और प्रसारण मंत्रालय के दिशानिर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं। साथ ही वो ये भी तय करते हैं कि किस चैनल का क्या स्वरूप होगा, उसका लक्ष्य क्या होगा, उनका बजट क्या होगा और किस तरह से चैनल के जरिए रेवेन्यू आएगा ये CEO और मार्केटिंग विभागों के साथ मिलकर उन्हें तय करना होता है। ये काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति है और इसके लिए संपादकीय प्रमुख को सालभर चैनल पर चौबीसों घंटे और सातों दिन होनेवाले प्रसारण पर ध्यान और उसका लेखा जोखा रखना पड़ता है। इस काम से जुड़ी जिम्मेदारियां आमतौर पर दूसरी कड़ी के तौर पर एडिटर, आउटपुट एडिटर और एग्जेक्यूटिव एडिटर पदनाम वाले लोंगों देने की व्यवस्था है, जिनका का काम कंटेंट पर नजर रखना और उसका प्रबंध करना है।  मैनेजिंग एडिटर अपने सहयोगियों और तमाम चैनलों के प्रमुखों प्रभारियों से सलाह मशविरे के बाद चैनलों की FPC  क्या होगी इसको मंजूरी देते हैं और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ये तय करते हैं कि किस चैनल की प्राथमिकता क्या होगी। जिन मीडिया संस्थानों में एक साथ कई चैनल नहीं चल रहे, सिर्फ एक समाचार चैनल हों, वहां भी संपादकीय प्रमुख की कुर्सी पर बैठे शख्स की मिलती-जुलती महती जिम्मेदारियां होती है। इस लिहाज से संपादकों की सामर्थ्य का अंदाजा लगाना मुश्किल है क्योंकि वो किस खबर को कितनी अहमियत देना पसंद करेंगे और उसका क्या असर होगा, ये देखनेवाली बात होती है। चैनल का कारोबार उन्ही की रणनीतियों के मुताबिक चलता है लिहाजा चैनल के उत्थान और पतन के जिम्मेदार भी वही माने जाते हैं। ऐसे में मैनेजिंग एडिटर या एग्जेक्यूटिव एडिटर, सीनियर एडिटर और एडिटर या फिर सीनियर एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर या एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर किसी भी समाचार चैनल में मालिक के बाद सबसे ताकतवर शख्सियत होते हैं, जिन पर चैनल को सुचारू रूप से और फायदे में चलाने का जिम्मा होता है। अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करने के लिए वो स्वतंत्र होते हैं, मसलन चैनल के लिए महत्वाकांक्षी बजट वाली योजनाएं बनाने, चैनल के लुक को तय करने और कर्मचारियों की नियुक्ति से लेकर उन्हें हटाने तक के तमाम मामलों में उन्हें अपनी शक्ति के इस्तेमाल का मौका मिलता है। संपादकीय प्रमुखों पर ही अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर ये जिम्मेदारी भी होती है कि वो अपने संगठन को चलाने में किस कर्मचारी  का कहां इस्तेमाल करें। ऐसे में उनकी पारखी नजरें किसी शख्स को उसकी क्षमता के मुताबिक, चैनल का सितारा बना सकती हैं, तो किसी को ऐसी जगह बिठा सकती हैं, जहां उसके लिए करने को कुछ भी सार्थक नहीं हो। अपने सहयोगियों और वर्क फोर्स की सैलरी और सालाना प्रमोशन और इंक्रीमेंट तय करना भी संपादकीय प्रमुखों की भी जिम्मेदारी होती है, ऐसे में उन्हें इस दुविधा की स्थिति से गुजरना पड़ता है कि किसी के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा है। वैसे सुलझे हुए संपादक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाते हैं, जिसमें हरेक कर्मचारी को अपना पूरा आउटपुट पेश करने का मौका मिलता है और उसी के आधार पर उसका प्रमोशन और इंक्रीमेंट तय होता है। ये बातें संपादकीय प्रमुख की सामर्थ्य को जाहिर करती हैं जिसके जरिए वो चैनल को चला सकता है।
सवाल है कि संपादकीय प्रमुख के पास जब इतनी बड़ी जिम्मेदारियां होती है, तो उससे क्या अपेक्षा की जाती है, उस कुर्सी पर बैठनेवाले व्यक्ति के पास क्या क्वालिटी होनी चाहिए। आजकल भारतीय समाचार चैनलों की स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति के पास खबरों की बेहतरीन समझ और उनके प्रबंधन की क्षमता हो, जिसे इन बातों का अंदाजा हो कि किस वक्त कौन सी खबर को अहमियत देना चैनल के फायदे में होगा और किस खबर का ट्रीटमेंट किस तरह से होना चाहिए, किस खबर के साथ कितना खेला जा सकता है, वो व्यक्ति सफल संपादकीय प्रमुख हो सकता है। हालांकि समाचार चैनल टीम वर्क है, सैकड़ों की संख्या में कर्मचारी चैनल में काम करते हैं, ऐसे में संपादकीय प्रमुख में सहज तौर पर नेतृत्व और फैसले लेने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि वो खबरों के साथ-साथ टीम लीडर के रूप में कर्मचारियों की व्यवस्था से जुड़े मामले भी सुलझा सके। उनके कल्याण का भी ख्याल रख सके और उनसे किस तरह काम लेना है, ये भी उसे अच्छी तरह पता हो। संपादकीय प्रमुख चैनल का चेहरा भी हो सकता है, जरूरी नहीं कि वो पर्दे के पीछे ही रहकर काम करे, ऐसे में जरूरी है कि उसमें लाइव प्रसारण के दौरान खबरों के विश्लेषण, कार्यक्रमों के मॉडरेशन और एंकरिंग की शानदार क्षमता हो। ऐसे कई लोग मौजूदा समाचार चैनलों में प्रमुख की कुर्सी पर बैठे हैं, जो अपने शुरुआती दौर में समाचार चैनलों के बेहतरीन रिपोर्टर और एंकर रहे हैं। भारतीय समाचार चैनलों के मुखियाओं के रूप में डॉ. प्रणय रॉय, राघव बहल, राजदीप सरदेसाई, अर्णब गोस्वामी, संजय पुगलिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी, दीपक चौरसिया, पूनम शर्मा, सतीश के. सिंह, सुधीर चौधरी, संजीव श्रीवास्तव, उपेंद्र रॉय, रवीश कुमार, निशांत चतुर्वेदी, कुमार राजेश , अतुल अग्रवाल, अभिरंजन कुमार ऐसे कई नाम हैं जो चैनलों की संपादकीय व्यवस्था से जुड़ने से पहले भी समाचार चैनलों पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। जाहिर है, अपनी ब्रैंडिंग के जरिए भी कई शख्सियतों को अपने समाचार चैनलों को दर्शकों के सामने पेश करने में काफी सुविधा हुई। इसके बाद अपनी संपादकीय क्षमता की बदौलत इन्होंने अपने चैनलों को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचाने की कोशिश की।
यहां एक और बात ध्यान देने की है वो ये कि अपनी क्षमता का बेहतरीन इस्तेमाल करके कोई शख्स समाचार चैनल को चलाने में कामयाब हो सकता है, लेकिन उसकी राह इतनी आसान नहीं होती। ताकतवर होते हुए भी संपादकों को कामकाज में कई बाधाओं से गुजरना पड़ता है, कई तरह की सीमाएं उनके कार्यक्षेत्र में होती हैं, जिनका ध्यान रखना पड़ता है। एक कहावत है- ‘अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता’ और महान रूसी लेखक दोस्तोएव्सकी ने अपने उपन्यास अपराध और दंड में एक और बात कही है, जिसको साबित करने की कोशिश उनका हीरो रस्कोल्निकोव करता है- ‘दुनिया में दो तरह के ही लोग होते हैं, एक वो जो अगुवाई करते हैं, दूसरे वो जो पीछे-पीछे चलते हैं’। रस्कोल्निकोव तो अपनी क्षमता आंकने की कोशिश में द्वंद्व का शिकार हो गया। लेकिन ‘अकेले चने’ और ‘आगे-आगे चलनेवाले चुनिंदा लोगों’ से जुड़ी दोनों ही बातें समाचार चैनलों में बड़े साफ तौर पर दिखती हैं। समाचार चैनल चलाना एक व्यक्ति के हाथ का खेल नहीं, उसे उस टीम पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसमें हर तरह के लोग होते हैं, कुछ अनुभवी, कुछ नए, कुछ कुशल, कुछ बेवकूफ, कुछ मेहनती, कुछ कामचोर- और इन हर तरह के लोगों से बेहतरीन आउटपुट हासिल करना संपादकीय प्रमुख के लिए बड़ी चुनौती है। यही उसकी सीमा है, जिसमें रहते हुए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाते हुए वो अपना काम करता है। चुंकि एक अकेला संपादकीय प्रमुख चौबीसों घंटे होनेवाले प्रसारण पर हमेशा खुद नजर नहीं रख सकता, ये व्यावहारिक तौर पर असंभव है, ऐसे में वो अपने साथ काम करनेवाले भरोसेमंद लोगों की टीम तैयार करता है, जो उसके बाद दूसरे और तीसरे स्तर पर कामकाज सुचारू रूप से और जिम्मेदार तरीके से चला सकें। ऐसे में संपादकीय प्रमुख की कुछ जिम्मेदारियां दूसरे सहयोगियों पर भी आ जाती हैं और वो भी बराबर के जवाबदेह हो जाते हैं। समाचार चैनलों में होनेवाली नियुक्तियों में अक्सर इस बात की झलक मिलती है कि वही लोग काम के लिए रखे जाते हैं, जिनकी पहले से या तो मार्केट में साख बनी हो, या फिर संपादकीय विभाग के लोग निजी तौर पर उनकी क्षमताओं के बारे में जानते हों। समाचार चैनलों में नौकरी के लिए अखबारों में विज्ञापन देकर और बायो डेटा के आधार पर छंटनी के बाद स्क्रीनिंग टेस्ट लेने की परंपरा ज्यादातर कागजी, दस्तावेजी और दिखावा भर होती है, नियुक्तियां तो आमतौर पर अनौपचारिक जानकारियों के आधार पर ही होती हैं क्योंकि कोई भी संपादकीय प्रमुख किसी अनजान शख्स से काम कराने का जोखिम तब तक नहीं लेना चाहता, जब तक वो किसी न किसी तरीके से उसके कामकाज के बारे में आश्वस्त हो। ऐसे में सीधी बातचीत के साथ-साथ सिफारिशों और Recommendations के जरिए चैनलों में नौकरियां मिलना आम बात हो चुकी है। इसीलिए अक्सर ऐसा देखा जाता है कि अगर कोई शख्स किसी समाचार चैनल में संपादकीय प्रमुख की हैसियत में नियुक्त होता है, तो वो अपने पुराने संस्थानों के भरोसेमंद सहयोगियों को भी अपने साथ ले जाकर अपनी टीम तैयार करने की कोशिश करता है। रोजगार की ये स्थिति प्राइवेट कॉरपोर्ट सेक्टर में कामकाज के उस मॉडल पर ही आधारित है जिसके तहत कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और टीम लीडर्स पर कंपनी का टार्गेट पूरा करने की जिम्मेदारी होती है और इसके लिए उसे अपनी पसंद के लोग चुनने की छूट होती है। ये स्थिति एक तरह से ठीक भी है, लेकिन नौकरी तलाशनेवाले आम लोगों के लिए बेहद कठिन, क्योंकि उनके लिए किसी बनी-बनाई टीम से अनाजान की हैसियत से जुड़ना संभव नहीं होता, क्योंकि उन्हें टीम का कोई खिलाड़ी जानता नहीं। ऐसे में आप अगर समाचार चैनल में काम करना चाहते हैं और किसी वरिष्ठ संपादकीय व्यक्ति से आपकी नजदीकी नहीं है, तो अगर किसी चैनल से इंटरव्यू का बुलावा आ भी जाए, तो आपके लिए सामने बैठे संपादकीय प्रमुख और अपनी क्षमता और योग्यता का भरोसा दिलाना आसान नहीं, आप यदि डींगें हांककर इंटरव्यू में अपनी छवि बना लेते हैं औऱ काम पा भी लेते हैं, तो आगे संपादक की कसौटी पर खरा उतरने के लिए परफॉर्म करना बड़ी चुनौती है, क्योंकि शीशमहल जैसा समाचार चैनल बाहर से जितना चमकदार और साफ-सुथरा दिखता है, उसके मुकाबले अंदर कांटों भरी कारपेट आपका स्वागत करने को तैयार रही है और संपादकों का भरोसा जीतने के लिए रोज चुभनेवाली कुर्सियों पर अपनी जगह बना पाना आपके लिए कोई खेल नहीं हो सकता। भरोसे और जिम्मेदारी का ये समीकरण टॉप लेवल पर भी होता है क्योंकि संपादकीय प्रमुख सीधे मालिक के प्रति और नियम कानूनों के प्रति जवाबदेह होते है, उन्हें चैनल के लाभ और घाटे का हिसाब देखना पड़ता है। ऐसे में जो कड़ी बनती है उसमें संपादकीय प्रमुख के प्रति उसके कनिष्ठ सहयोगी जवाबदेह होते हैं जिससे कुछ बेहतरीन प्रसारित होने पर उन्हें बॉस की तारीफ मिलती है, तो कुछ गलत जाने पर फटकार भी और नौकरी जाने का खतरा भी रहता है, क्योंकि जवाबदेही की ये कड़ी संपादकीय प्रमुख से जुड़ी रहती है जिससे चैनल पर प्रसारित होनेवाली गलतियों और खराब परफॉरमेंस के चलते उसे अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ सकती है। ऐसे में अपनी नौकरी को ताक पर रखकर वो दूसरे सहयोगियों की गलतियां कैसे बर्दाश्त कर सकता है। दूसरी सीमा है खबरों और प्रसारण से जुड़ी हुई। तमाम कानूनों, नियम-कायदों, उसूलों और नैतिकता के दायरे में खबरों का प्रसारण करना होता है। ऐसे में संपादकीय प्रमुख को तय नीतियों और कुछ ‘Set of rules’ के आधार पर काम करना पड़ता है यानी कौन सी खबर प्रसारित होनी चाहिए या नहीं और किस रूप में, ये पहले तय हो। दर्शकों को अपने चैनल की ओर आकर्षित करने के लिए वो किसी ऐसे विजुअल या स्टोरी के प्रसारण की इजाजत नहीं दे सकता, जिससे सनसनी फैले, या अफवाह फैले या फिर जिसका प्रसारण उत्तेजना भड़काए। भले ही निजी तौर पर किसी को कोई चीज पसंद आ सकती है, लेकिन उसका सार्वजनिक प्रसारण सार्वजिनक असर को देखते हुए ही किया जा सकता है या नहीं किया जा सकता – खबर का क्या असर होगा- संपादकीय प्रमुख को इस सीमा में रहकर ही फैसले लेने पड़ते हैं। एक और बड़ी सीमा है समाचार चैनलों के सालाना बजट की। कॉरपोरेट क्षेत्र की हर कंपनी की तरह चैनलों को भी बजट के हिसाब से काम करना होता है, रेवेन्यू जेनरेट करने और खर्चों में कटौती का लक्ष्य होता है। ऐसे में संपादकीय प्रमुख की कोशिश ये होती है कि वो कम से कम मैन पॉवर में ज्यादा से ज्यादा आउटपुट हासिल करे, पैसे उन्हीं प्रोजेक्ट्स में लगाए जाएं, जिनसे अच्छे मुनाफे की संभावना हो, संवाददाताओं के गैर-जरूरी दौरों और विदेश दौरों को प्रोत्साहन न दिया जाए, सैलरी और इंक्रीमेंट की स्थिति संतुलित रखी जाए, ताकि चैनल के बजट पर बोझ न बढ़े। हालांकि संपादकीय प्रमुखों के असीमित विशेषाधिकार होते हैं, जिन्हें वो चैनल की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उसके साथ तब तक जुड़ा होता है जवाबदेही का भी मामला जब तक संपादकीय प्रमुख खुद चैनल के मालिक नहीं होते। अगर मालिक ही संपादकीय प्रमुख भी होते हैं, तो उन्हें भी उन तमाम मुद्दों पर गौर करना पड़ता है जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है क्योंकि समाचार चैनलों का संचालन आज के दौर में शुद्ध रूप से कारोबार है जिसे चलाने के लिए मुनाफे और घाटे का हिसाब रखना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। संपादकीय प्रमुखों की कुछ नैतिक सीमाएं भी होती हैं जिनका ध्यान कर्मचारियों के साथ बर्ताव और उनसे संबंधों के मामले में रखना पड़ता है। कर्मचारियों से मानवाधिकारों और नियम कानूनों के दायरे में ही काम लेने की व्यवस्था है, ऐसे में उनके प्रबंधन, कामकाज और कल्याण के दायरे निर्धारित होने चाहिए। साथ ही, कर्मचारियों  के साथ संपादकीय प्रमुखों के संबंध भी पेशेवर होने चहिए, भले ही उनकी आपसी रिश्तेदारी भी हो, क्योंकि मामला आखिरकार जिम्मेदारी से जुड़ा है और कारोबार की जिम्मेदारी घर परिवार से अलग हटकर सबसे अहम होती है।
अनुभव, आवश्यकता और व्यवस्था के मुताबिक समाचार चैनलों और संगठनों में एकाधिक संपादक होते हैं और संपादकों की hierarchy भी बनाई जाती है, इसी लिहाज से पदनाम में कई और विशेषण जुड़ जाते हैं, या फिर उनमें कुछ शब्दों का हेर-फेर हो जाता है। मसलन
एडिटर इन चीफ- ये संगठन के मालिक के स्तर का व्यक्ति होता है, यानी संपूर्ण कर्ता-धर्ता
मैनेजिंग एडिटर- हैसियत मालिक की नहीं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर चैनल के कामकाज की महती जिम्मेदारी, सभी विभागों का मुखिया
चीफ एडिटर- मैनेजिंग एडिटर जैसा ही पद, अनुभव और संगठन की आवश्यकता के आधार पर पदनाम का सृजन
एग्जेक्यूटिव एडिटर- कंटेंट प्रबंधन के लिए जिम्मेदार, मैनेजिंग एडिटर जैसा ही पद, अनुभव और संगठन की आवश्यकता के आधार पर पदनाम का सृजन
एडिटर- कंटेंट प्रबंधन के लिए जिम्मेदार, कंटेंट और प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालते हैं
सीनियर एडिटर- कंटेंट प्रबंधन के लिए जिम्मेदार, कंटेंट से ही जुड़ी जिम्मेदारियां संभालते हैं, न्यूज़ डेस्क, एसाइनमेंट के कामकाज तक सीमित भूमिका
आउटपुट एडिटर- न्यूज़ डेस्क और समाचार चैनल के प्रसारण से जुड़े रोजाना के कामकाज के लिए जिम्मेदार
इनपुट एडिटर- समाचार चैनलों में समाचार प्रवाह और उनके प्रबंधन, मसलन रिपोर्टिंग, ब्यूरो, एसाइनमेंट की जिम्मेदारी
एसोसिएट एडिटर- न्यूज़ डेस्क पर रोजाना के कामकाज देखने की जिम्मेदारी, वरिष्ठों के सहयोग की जिम्मेदारी, समाचार चैनल के बुलेटिन्स की जिम्मेदारी, किसी खास कार्यक्रम के प्रभारी हो सकते हैं
एसिस्टेंट एडिटर- समाचार चैनल के बुलेटिन्स की जिम्मेदारी, किसी खास कार्यक्रम के प्रभारी हो सकते हैं
मेट्रो एडिटर- मेट्रो और बड़े शहरों से से जुड़े मामलों पर आधारित समाचारों और कंटेंट का प्रबंधन
पॉलिटिकल एडिटर- सीनियर पॉलिटिकल रिपोर्टर, राजनीतिक मामलों पर आधारित समाचारों और कंटेंट का विश्लेषण और प्रबंधन
क्राइम एडिटर- अपराध जगत की खबरों पर कंटेंट का प्रबंधन
स्पोर्ट्स एडिटर- खेलों की खबरों और उनके कार्यक्रम की जिम्मेदारी
एंटरटेनमेंट एडिटर- सिनेमा और मनोरंजन की खबरों और कार्यक्रम की जिम्मेदारी
अखबारों में रेजिडेंट एडिटर के पद भी होते हैं, जो PIB नियमों के तहत रोजाना छपनेवाली खबरों के लिए जिम्मेदार होते हैं। समाचार चैनलों में ये जिम्मेदारी, एडिटर, सीनियर एडिटर, आउटपुट एडिटर की हो सकती है।
      टेलीविजन के समाचार चैनल चुंकि ऑडियो-विजुअल मीडिया हैं, लिहाजा यहां काम करनेवालों के पदनाम पर फिल्म निर्माण की व्यवस्था का भी असर देखने को मिलता है। ऐसे में संपादकीय कामकाज और जिम्मेदारियों से जुड़े लोगों के पदनाम में एडिटर या संपादक की जगह आमतौर पर प्रोड्यूसर भी जुड़ा हुआ दिखता है। लेकिन जिम्मेदारियां लगभग बराबर होती हैं। सैद्धांतिक तौर पर ये माना जाता है कि प्रोड्यूसर पदनाम संभालनेवाले लोग समाचार चैनलों के प्रसारण से जुड़े तकनीकी पक्ष को भी जानते और समझते हों, सिर्फ खबरों के प्रबंधन और उनकी स्क्रिप्टिंग तक उनकी जिम्मेदारी सीमित न हो। इस तरह ऊपर से नीचे तक ‘प्रोड्यूसर’ की पूंछ वाले तमाम पदनाम समाचार चैनलों में दिख जाएंगे। मसलन-
सीनियर एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर- मैनेजिंग एडिटर के समकक्ष या थोड़ी कम अहमियत
एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर- ये एग्जेक्यूटिव एडिटर, आउटपुट एडिटर, इनपुट एडिटर के समकक्ष होते हैं, कार्यक्रमों के कंसेप्ट तय करने से जुड़ी जिम्मेदारी प्रमुख मानी जाती है
डिप्टी एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर/ न्यूज़रूम इंचार्ज- एडिटर, सीनियर एडिटर के समकक्ष, समाचार चैनलों के कंटेंट और प्रबंधन की जिम्मेदारी, अलग-अलड डेस्क, बिजनेस, स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट वगैरह की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से संभाल सकते हैं
एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर- न्यूज़ डेस्क, एसाइनमेंट डेस्क के प्रभारी, रोजाना के कामकाज और प्रबंधन की जिम्मेदारी, शिफ्टों का प्रभार संभाल सकते हैं
एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर/ प्रोड्यूसर- खबरों की स्क्रिप्टिंग, पैकेजिंग, रनडाउन, टिकर, बुलेटिनों, समाचार आधारित कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण की जिम्मेदारी, एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर और दूसरे वरिष्ठों का सहयोग
एसोसिएट प्रोड्यूसर/ एसिस्टेंट प्रोड्यूसर- खबरों की स्क्रिप्टिंग, पैकेजिंग, रनडाउन, टिकर, बुलेटिनों, समाचार आधारित कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण की जिम्मेदारी, एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर और दूसरे वरिष्ठों का सहयोग
प्रोडक्शन एग्जेक्यूटिव/ ट्रेनी- खबरों की स्क्रिप्टिंग, पैकेजिंग, रनडाउन, टिकर पर सहयोग की जिम्मेदारी, जिनके जरिए वो समाचार चैनलों का काम सीख सकें।
संपादकीय जिम्मेदारी देखनेवालों के कुछ और भी उच्च पद हैं, जैसे को-ऑर्डिनेटिंग एडियर, ग्रुप एडिटर, कंसल्टिंग एडिटर, एडिटर एट लार्ज, कंट्रिब्यूटिंग एडिटर, जो ऐसे बड़े मीडिया संस्थानों में होते हैं, जहां कई चैनल, अखबार, मैगजीन और ऑनलाइन जैसी तमाम संपादकीय व्यवस्थाएं एक साथ काम कर रही हों। किसी एक समाचार चैनल में इस तरह के पद आमतौर पर नहीं होते, और होते भी हैं, तो ये कामकाज की विविधता पर निर्भर करता है कि किस व्यक्ति को ऐसे पद पर क्यों रखा गया है और उसकी असल जिम्मेदारी क्या है।
      एडिटर या प्रोड्यूसर दोनों ही तरह के पदनामों पर काम करनेवाले लोग समाचार चैनलों के खबरों से जुड़े रोजाना के कामकाज से इत्तेफाक रखते हैं। आम समझदारी के हिसाब से एडिटर कहलाने वालों को तकनीकी पक्ष से अलग –खांटी तौर पर खबरों का काम करनेवाला, लेखन और रिपोर्टिंग से जुड़ा माना जाता है, वहीं प्रोड्यूसर पदनाम वाले कर्मचारी बुलेटिनों और समाचार आधारित करंट अफेयर्स के कार्यक्रमों के आइडिया निकालने से लेकर उनके प्रसारण तक- तकनीकी पहलुओं की भी समझदारी रखने के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार माने जाते हैं। यानी एक तरफ खबरिया नजरिया प्रमुख है, तो दूसरी तरफ प्रबंधन और तकनीकी पक्ष। दोनों ही तरह के पदनामों के व्यावहारिक कामकाज में ये बड़ा झीना सा फर्क है क्योंकि समाचार चैनलों में दोनों ही तरह के पदनामों वाले लोग हर तरह के काम करते नजर आते हैं और पदनाम से निरपेक्ष उन्हें जो भी जिम्मेदारी सौंपी जाती है उसे वो निभाते हैं। ऐसे में ये समझना होता कि पदनामों का ये फर्क देश में अखबारी पत्रकारिता और टेलीविजन के विस्तार की देन है। शुरुआती दौर में टेलीविजन के समाचार चैनलों में ऐसे लोगों की एंट्री हुई जो अखबारों में काम कर चुके थे और उनके लिए संपादन से जुड़ा पदनाम पत्रकारीय समझ और कामकाज के नजरिए से गौरवपूर्ण था, ऐसे में उन्हें इस तरह के पदनाम दिए गए, जिनमें ‘एडिटर’ की पूंछ जुड़ी हो। वहीं ऐसे लोग भी थे, जो FTII जैसे संस्थानों से ट्रेनिंग लेकर आए और चैनलों के तकनीकी पहलुओं में सिद्धहस्त थे, लेकिन खबरों की प्रसारण में उनकी खास दखल थी। ऐसे लोग प्रोड्यूसर से जुड़ी पदवी पाने लगे। समाचार चैनलों में आनेवाले नए मैनपॉवर को भी खबरों यानी रिपोर्टिंग और न्यूज़ डेस्क के हिसाब से बांटा गया और इसी तरह से उनके पदनामों का भी निर्धारण शुरु हुआ। कुल मिलाकर आज व्यावहारिक स्थिति ये है कि आम एसोसिएट एडिटर हों, या प्रोड्यूसर- काम आपको एक ही तरह का करना पड़ सकता है और आप अपने पद का हवाला देकर उससे इंकार तो कर ही नहीं सकते।
       संपाकदीय प्रमुखों के पास बड़ी जिम्मेदारियां होती हैं, लिहाजा वो छोटी, लेकिन Blunder कहलानेवाली गलतियों को चेक करने के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकते। ये जवाबदेही एसोसिएट एडिटर, सीनियर प्रोड्यूसर और शिफ्ट प्रभारियों पर होती है। वहीं, निषिद्ध सामग्रियों का प्रसारण न हो, इसका ध्यान रखना एडिटर, आउटपुट एडिटर, डिप्टी एग्जडेक्य़ूटिव एडिटर, एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर के स्तर का है। समाचार चैनलों में खबरों के संपादन और उनसे जुड़े कार्यक्रमों की तैयारी का खांटी संपादकीय जिम्मा प्रोड्यूसर जैसे निचले दर्जे के कर्मचारियों पर होता है। निचले दर्जे के कर्मचारी खबरों स्क्रिप्ट लिखने , उनमें काट-छांट, अनुवाद और उनकी वीडियो एडिटिंग का काम करते हैं और वरिष्ठ यानी शिफ्ट प्रभारी, सीनियर प्रोड्यूसर, उनके काम की जांच करते हैं, उन्हें सुपरवाइज करते हैं। करंट अफेयर्स कार्यक्रमों के कंसेप्ट, रूपरेखा और नामकरण पर और भी वरिष्ठ संपादक विचार करते हैं। इन मुद्दों पर मंजूरी देना खुद संपादकीय प्रमुख या दूसरे अधिकृत संपादकों का काम है। ऐसे में संपादकीय प्रमुख से लेकर सबसे निचले स्तर तक पिरामिड के रूप में संपादकीय व्यवस्था समाचार चैनलों में काम करती है। ये ऐसी व्यवस्था है, जिसमें निचले स्तर पर होनेवाले बदलावों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता यानी सैनिक बदलते रहते हैं, लेकिन सेना बरकरार रहती है, वहीं अगर सबसे ऊपर बदलाव हो, तो फिर मध्यम स्तर पर काफी उलटफेर देखने को मिल सकता है और चैनल की रीढ़ भी टूट सकती है। ऐसे में संपादकीय प्रमुखों की नियुक्ति या उन्हें हटाए जाने के बाद कुछ वक्त तक चैनलों में अनिश्चितता, उलझन और असमंसज की स्थिति बनी रहती है, Mid-level पर भी बदलाव शुरु हो जाते हैं, नई टीमें बनने लगती हैं, जिससे चैनल के काम काज पर भी असर पड़ता है। ऐसे में जरूरी ये है कि जो भी व्यक्ति संपादकीय प्रमुख की कुर्सी पर हो, वो सभी कर्मचारियों को विश्वास में लेकर काम करे। साथ ही चैनल में एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसके तहत किसी कोर टीम के बजाय अलग-अलग विभागीय स्तर पर  जिम्मेदारियां तय हों, ताकि कर्मियों को विकास का मौका भी मिले और ऊपर से बदलाव होने पर दीवार दरकने की संभावना न रहे। ऐसी व्यवस्था में संपादकीय प्रमुख को रिंगमास्टर के समान हर विभाग पर निगरानी रखनी होगी और चैनल में 24 घंटे प्रसारण के दौरान रोज होनेवाली चिल्ल-पों से छुटकारा पाकर कुछ हद तक सांस लेने का मौका मिल सकता है । ये मुद्दा प्रबंधन और संपादकीय प्रमुख को मिलकर तय करना होगा क्योंकि आखिकार कंटेट के प्रबंधन के लिहाज से कोई संपादकीय प्रमुख किस तरह काम चलाना चाहता है, ये तो उसी को तय करना होगा।
-कुमार कौस्तुभ
25.04.2013, 7.15 AM

Tuesday, April 23, 2013

स्ट्रिंगरः खबर का कारोबार या पूर्णकालिक रोजगार?




टेलीविजन के समाचार चैनलों को खबरें कितने स्रोतों से मिल सकती हैं, इसका विस्तृत विवेचन पहले किया जा चुका है। लेकिन ‘स्ट्रिंगर्स’ के बारे में बात किए बगैर ये चर्चा अधूरी है। अंग्रेजी के शब्द ‘स्ट्रिंग’ का मतलब होता है डोर या तार और इसी से जुड़ा है ‘स्ट्रिंगर’ जिसका शाब्दिक अर्थ देखें तो यहीं समझेंगे कि वो शख्स जो चैनल से खबरों को जोड़ता है या जो खबर को चैनल तक पहुंचाने में शामिल होता है। टेलीविजन समाचार के स्रोत के तौर पर व्यावहारिक रूप में ‘स्ट्रिंगर’ कुछ इसी अर्थ में इस्तेमाल किए जाते हैं यानी वो समाचार चैनलों के लिए खबर देनेवालों की श्रेणी में शामिल भी होते हैं और खबरें देकर खबरबाजी के तार भी जोड़ते हैं। चुंकि हर खबरिया घटनाक्रम के मौके पर चैनल के अधिकृत संवादादाता नहीं पहुंच सकते लिहाजा चैनल से खबरों के तार जोड़ने की जिम्मेदारी स्ट्रिंगर पर आ जाती है। व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो टेलीविजन चैनलों में ‘स्ट्रिंगर’ शब्द वैसे संवाददाताओं के लिए प्रचलित है, जो चैनल के पूर्णकालिक कर्मचारी नहीं होते, ना ही उन्हें नियमित वेतन मिलता है, ना ही चैनल के कर्मचारियों की सुविधाएं हासिल होती हैं। यानी दूसरे शब्दों में इनका काम अंशकालिक संवाददाता या स्वतंत्र पत्रकार- फ्रीलांस जर्नलिस्ट के रूप में समझा जा सकता है, जो चैनलों को खबरें और उनसे जुड़ी सामग्रियां मुहैया कराते हैं। हालांकि तकनीकी तौर पर देखें तो स्ट्रिंगर, अंशकालिक संवाददाता और फ्रीलांस जर्नलिस्ट में फर्क है। अंशकालिक संवाददाता आमतौर पर चैनलों की ओर से अधिकृत होते हैं और उन्हें चैनलों की ओर से पहचान और कुछ सुविधाएं भी मिलती हैं, जबकि फ्रीलांस जर्नलिस्ट पूरी तरह स्वतंत्र रूप से सिर्फ पत्रकारिता करते हैं और तमाम चैनलों और दूसरे मीडिया संगठनों के लिए काम कर सकते हैं। इन दोनों से अलग स्ट्रिंगर संवाददाताओं की उस भीड़ का हिस्सा हैं, जो मूलत: और सैद्धांतिक तौर पर पत्रकार नहीं होते, लेकिन अपने इलाके में पत्रकार के रूप में ही जाने-पहचाने जाते हैं और समाचार के कारोबार में उनकी बड़ी हिस्सेदारी होती है। अंशकालिक संवादादाता भी मूल रूप से पत्रकार नहीं होते और दूसरे पेशों के साथ-साथ शौकिया तौर पर या अतिरिक्त काम के रूप में खबरें जुटाने का काम करते हैं। वहीं, स्ट्रिंगर अक्सर पूर्णकालिक तौर पर खबरें जुटाने के काम में लगे पाए जाते हैं, लेकिन समाचार चैनलों से आमतौर पर उन्हें पत्रकारीय पहचान नहीं मिलती। यहां से स्पष्ट कर देना जरूरी है कि पहचान के तौर पर चैनलों की ओर से उन्हें आईकार्ड और चैनल आईडी दिया जाना चैनलों पर निर्भर करता है और इसका कोई तय मापदंड या निर्धारित नीति नहीं है, ये हर आदमी के काम और उसकी उपयोगिता या समय और परिस्थितियों के मुताबिक सीमित तौर पर अधिकृत किए जाने तक ही है, जिससे उनकी स्थिति संवाददाताओं के बराबर नहीं मानी जाती । फर्क काम के बदले मिलनेवाली रकम को लेकर भी है। अंशकालिक संवाददाताओं को जहां महीने में बंधी-बंधाई या एकमुश्त रकम मिल सकती है, वहीं स्ट्रिंगर्स और फ्रीलांसर्स को खबरों की स्टोरी या आइटम के हिसाब से पैसे देने का चलन है। सबसे अहम मुद्दा पहचान का है, चुनिंदा स्ट्रिंगर्स को चैनलों की ओर से माइक आईडी और पहचान मिलती भी है, लेकिन देश में बड़ी संख्या ऐसे स्ट्रिंगर्स की है, जिनके पास किसी चैनल की पहचान नहीं होती, खबरों के संकलन के लिए या रिपोर्टिंग के लिए चैनल की ओर से वास्तविक तौर पर अधिकृत नहीं होते और अपने बल-बूते खबरें और उनसे जुड़ी कच्ची सामग्री जुटाकर और उन्हें बेचकर अपना पेट पालते हैं।
सवाल ये है कि समाचार चैनलों को स्ट्रिंगर्स की जरूरत क्यों है और अगर है तो उन्हें वो पहचान क्यों नहीं मिलती, जिसकी उन्हें दरकार होती है? भारत में हाल के वर्षों में जितनी तेजी से टेलीविजन के समाचार चैनलों का विस्तार हुआ है, उससे ज्यादा तेजी से खबरों का प्रवाह बढ़ा है। इसकी एक वजह तकनीक और प्रौद्योगिकी की आम आदमी तक पहुंच बढ़ने के साथ-साथ खबर जुटाने में इस्तेमाल होनेवाले संसाधनों का सस्ता होना भी है। पहले बात खबरों की- देश के कोने-कोने में खबरें पैदा होती हैं और समाचार चैनलों के लिए उन्हें वीडियो और ऑडियो और तस्वीरों समेत हासिल करना एक बड़ी चुनौती है, बशर्ते उनके संवाददाता चप्पे-चप्पे पर फैले न हों। समाचार चैनलों के लिए हर कस्बे, हर शहर में अपने पूरे खर्च पर संवाददाता नियुक्त करना भी मुनासिब नहीं, क्योंकि हर इलाके से रोज इतनी और ऐसी गुणवत्ता वाली खबरें हासिल हों, जिनका चैनल के दर्शक वर्ग या टार्गेट ऑडिएंस के हिसाब से राष्ट्रीय या क्षेत्रीय महत्व हो। ऐसे में स्ट्रिंगर्स की जमात उन खबरों को इकट्ठा करने और चैनल तक पहुंचाने का इंतजाम करती है, जो चैनल के लिए जरूरी हों, और दिलचस्प हों। लिहाजा स्ट्रिंगर्स की अहमियत बढ़ जाती है। दूसरी बात ये कि संचार माध्यमों इलेक्ट्रॉनिक साधनों औऱ सूचना प्रौद्योगिकी के विकास से वीडियो कैमरे, कैमकॉर्डर जैसी चीजें, जो पहले चुनिंदा लोगों के शौक में शुमार होती थीं, अब काफी सस्ती हो चुकी हैं और कम पैसे में उच्च प्रौद्योगिकी और प्रसारण की क्वालिटी वाले साधन उपलब्ध होने लगे हैं, लिहाजा इनका बढ़-चढ़कर इस्तेमाल news gathering  के लिए होने लगा है और अब तो आलम ये है कि तीसरी आंख यानी कैमरे के फ्रेम से, उसकी जद से कोई भी खबर छूट नहीं सकती। ये काम स्ट्रिंगर्स करते हैं, जो जगह-जगह से खबरें जमा करते हैं और समाचार चैनलों को उपलब्ध कराते हैं। लेकिन उन्हें समाचार चैनलों की ओर से पहचान इसलिए नहीं मिलती क्योंकि वो पूर्णकालिक कर्मचारी के रूप में चैनल में नियुक्त नहीं किए जाते और जरूरत के मुताबिक उनका इस्तेमाल होता है। ऐसे में चैनल की पहचान के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है, जिसका खतरा चैनल नहीं उठाना चाहते।
स्ट्रिंगर्स को समाचार चैनलों से जोड़ने की शुरुआत जिस तरह हुई मानी जाती है, वो news gathering  का एक बेमिसाल तरीका है। पहले पहल देश में आकाशवाणी और फिर दूरदर्शन ने जिला मुख्यालयों, छोटे शहरों और कस्बों में अंशकालिक संवाददाताओं की नियुक्ति शुरु की थी जिसका मकसद समाचार माध्यम के लिए खबरों का नेटवर्क तैयार करना था। इसके लिए ऐसे पढ़े लिखे लोगों, वकीलों, शिक्षकों और समझदार लोगों को अंशकालिक संवाददाता का दर्जा देकर जोड़ा गया था, जिन्हें खबर की समझ हो, हिंदी और अंग्रेजी में खबर लिख सकने और उसे टेलीफोन पर बता सकने की क्षमता और सुविधा हो। पुराने जमाने में न तो इतने चैनल थे, ना ही खबरों पर उतनी पकड़ की जरूरत थी, लिहाजा बड़ी खबरों पर निगाह बनाए रखने के लिए अंशकालिक संवाददाताओं को मामूली रकम या खबरें भेजने का खर्च देकर काम कराया जाता था। हालांकि उनके पास आकाशवाणी-दूरदर्शन की कुछ पहचान होती थी और इसके चलते ऐसे चुनिंदा लोग भी क्षेत्रों में अपनी धाक जमा लेते थे, लेकिन चुंकि खबरों के प्रसारण का स्कोप ज्यादा नहीं था, लिहाजा वो उनका अपने मन मुताबिक इस्तेमाल नहीं कर पाते थे, फायदे नहीं उठा पाते थे, फिर भी समाज में पत्रकार और बुद्धिजीवी के तौर पर लोग उन्हें जानते और पहचानते थे, जिसका उन्हें समय-समय पर फायदा मिलता भी था। लेकिन कुल मिलाकर उनकी पहचान पत्रकार के रूप में शहर और इलाके के गणमान्य व्यक्तित्वों में होती थी और आकाशवाणी का अंशकालिक संवाददाता होना भी गौरव का विषय माना जाता था जिससे तमाम सरकारी महकमों और दफ्तरों से लेकर बडे अफसरान के यहां उनकी सीधी एंट्री होती थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ ही जब समाचार चैनलों की बहुतायत बढ़ी तो छोटे शहरों या जिला मुख्यालयों में ऐसे लोगों की जरूरत पड़ने लगी जिनकी खबरों में दिलचस्पी हो, वो चलता-पुर्जा हों, भागदौड़ कर सकते हों और स्टोरी जुटाकर भेज सकते हों। इस क्रम में तमाम ऐसे लोग चैनलों से जुड़े, जिनके पास अखबारों में लिखने-पढ़ने का थोड़ा-बहुत अनुभव था , और ऐसे लोग भी जुड़ने लगे जिनके समाचार चैनलों में संपर्क थे, मसलन संपादकीय विभाग में काम करनेवालों की जान-पहचान के लोग, केबल टीवी, विज्ञापन, फोटो स्टूडियो और शादी समारोहों की वीडियो कवरेज करनवाले छोटे-बड़े कारोबारी जिनका पत्रकारिता से कभी कोई वास्ता भले ही नहीं था, लेकिन, वीडियो और बाइट का प्रबंध करना उनके लिए किसी पारंपरिक पत्रकार के मुकाबले आसान था। केबल टीवी और विज्ञापन कारोबार से जुड़े लोगों को स्ट्रिंगर बनाने का मकसद किसी न किसी रूप से निजी समाचार चैनलों के कारोबार के हितों से भी जुड़ा हुआ था। इस तरह ‘एक ही साधे सब सधे’ की नीति पर स्ट्रिंगर बनाने की परिपाटी चल पड़ी और जब कारोबार जगत के खिलाड़ी इसमें उतरने लगे, तो पत्रकारिता पर फर्क तो पड़ना ही था।
खबरों के कारोबार की गलाकाट प्रतियोगिता में कोई भी समाचार चैनल पिछड़ना नहीं चाहता, लिहाजा स्ट्रिंगर्स उनके लिए बेहद जरूरी या यूं कहें कि रीढ़ के समान हो चुके हैं, जो खबरों के अलावा उनसे जुड़ा सारा कच्चा माल भी इकट्ठा करते हैं। इसके बावजूद व्यावहारिक तौर पर चैनलों में उन्हें वो अहमियत नहीं मिलती, जिसके वो पात्र होते हैं। कारोबारी मानसिकता के तहत उनसे काम लिया जाता है और स्टोरी के हिसाब से भुगतान होता है। कई चैनलों में छोटे-छोटे सुदूर इलाकों के स्ट्रिंगर्स को भुगतान भी वक्त पर नहीं होने की अंदरूनी खबरें आती रहती हैं, जिसका विपरीत असर उनकी परफॉरमेंस पर पड़ता है और वो लोग जो कभी शौक के तौर पर खबरों की दुनिया से स्ट्रिंगर की तरह जुड़े होते हैं, वो धीरे-धीरे उसके कारोबारी बनने लगते हैं। ये स्ट्रिंगरों के पेशे का एक ऐसा स्याह पहलू है, जिसमें पत्रकारिता के उसूलों को ताक पर रख दिया जाता है और खबरों के नाम पर धंधेबाजी शुरु हो जाती है। समाचार चैनलों के लिए स्ट्रिंगर जरूरी हैं, लेकिन जरूरत के मुताबिक ही, लिहाजा कोई भी चैनल ऐसे लोगों को अपनी ओर से पूर्णकालिक रूप से अधिकृत नहीं करना चाहता ताकि उसकी किसी हरकत ये चैनल की साख पर खतरा न पैदा हो। ऐसे में स्ट्रिंगर्स के लिए खबरें जुटाना उनके अपने कौशल, स्थानीय और क्षेत्रीय संपर्कों, अपनी सूझ-बूझ और काफी हद तक अपनी दबंगई पर निर्भर करता है। जो स्ट्रिंगर जिस चैनल के लिए काम करता है, उस पर भले ही खबरों के साथ उसकी बाइलाइन यानी नाम और क्रेडिट न जाए, लेकिन विजुअल मीडिया होने की वजह से , जो स्टोरी, विजुअल और बाइट वो भेजते हैं, उनके प्रसारण से भी उनकी पहचान क्षेत्र में बनने लगती है जिसका फायदा वो अपने लिए उठाते हैं। पेशे का काला पक्ष ये है कि पहचान बन जाने के बाद स्ट्रिंगर्स की क्षेत्रीय दफ्तरों, पुलिस और प्रशासन में पैठ बन जाती है जिसका वो अक्सर फायदा उठाते हैं और इसकी बदौलत उन पर दलाली, कमाई के हथकंडे अपनाने, ब्लैकमेलिंग और दूसरे तमाम आरोप भी अक्सर लगते पाए जाते हैं। पत्रकारीय सिद्धांतों और उसूलों से कोई मतलब न होने की वजह से स्ट्रिंगर खबरों के ‘धंधे’ में इस कदर उतरते हैं कि कई बार उन पर जबरन खबर बनाने और ऐसे मामलों को भी रोशनी में लाने के आरोप लगते हैं, जिनका खबर से कोई लेना-देना नहीं होता। छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में पत्रकारिता के नाम पर डॉन बन कर बैठे कई स्ट्रिंगर चैनल और पेशे को बदनाम करने में जुटे पाए जाते हैं।
हालांकि प्रतियोगिता बढ़ी तो हालात भी बदले और तमाम नए लोग इस पेशे से जुड़े जिनकी वाकई दिलचस्पी पत्रकारिता में थी, लेकिन समाचार चैनलों की स्थिति के हिसाब से ये आसान नहीं रहा। समाचार चैनलों में खर्चों की कटौती होने लगी, राज्यों के समाचार ब्यूरो छोटे हो गए, स्ट्रिंगर्स बढ़ गए, लेकिन, स्टोरीज़ के लिए मिलनेवाली रकम में कमी आने लगी और स्ट्रिंगर्स पर खर्च मैनेज करने का दबाव बढ़ने लगा। ऐसे में सवाल ये है कि स्ट्रिंगर किस तरह काम करें। जिन लोगों के पास और भी साइड बिज़नेस है, या जिनके लिए स्ट्रिंगर का काम करना ही साइड बिज़नेस है, उनके लिए तो परेशानी नहीं, क्योंकि वो चैनल की जरूरत और मांग के मुताबिक स्टोरी कवर करने लगे हैं, लेकिन जो लोग पूर्णकालिक तौर पर सिर्फ इसी काम को अपना पेशा बनाए बैठे हैं, उन्हें योजनाबद्ध तरीके से काम करना पड़ता है। उन पर कम से कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा स्टोरीज़ जुटाने की चुनौती होती है।
अब सवाल ये है कि स्ट्रिंगर काम कैसे करते हैं? आमतौर पर हर स्ट्रिंगर 50 से 100 किलोमीटर के दायरे में काम करते हैं, News gathering के लिए वो अपने इलाके के पुलिस-प्रशासन और सरकारी दफ्तरों के संपर्क में रहते हैं, जहां से सरकारी और अपराध से जुड़ी खबरें मिलती हैं। इलाके के सांसद और विधायकों से संपर्क भी खबरें निकालने में काम आता है। इसके अलावा अखबारों और अखबारों के साथी पत्रकारों के माध्यम से उन्हें ऐसी खबरों के बारे में भी जानकारी मिलती है, जिन पर खास स्टोरी की जा सकती और जो जल्द आउटडेटेड नहीं होतीं। ऐसी तमाम खबरों के आइडियाज़ वो संबंधित चैनल को भेजते है, जहां से मंजूरी के बाद उन्हें स्टोरी फाइल करने की तैयारी करनी होती है। इस प्रक्रिया में स्ट्रिंगर्स को ये ख्याल रखना होता है कि वो अगर एक दिन में दो से तीन स्टोरीज़ कवर कर लेते हैं, तो उनका वक्त भी बचेगा और खर्च भी। हालांकि बड़े रेल, बस हादसों, आपदाओं और आपराधिक मामलों से जुड़ी खबरों की स्थिति में उन्हें तत्काल स्पॉट पर पहुंचना होता है और जानकारियां जुटानी पड़ती हैं, ताकि जल्द से जल्द समाचार चैनल को इनपुट दिया जा सके। आम तौर पर बड़े मामलों में उनसे फोन पर जानकारी ली जाती है और फोन वार्ताओं का सीधा प्रसारण भी होता है, जो मौके पर चैनल की उपस्थिति को दर्ज कराता है और पल-पल की जानकारी दर्शकों को हासिल होती है। ऐसी स्थिति के लिए स्ट्रिंगर्स को हमेशा तैयार रहना पड़ता है और वो अगर मीडिया की दुनिया में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो ऐसे मौके उनकी प्रतिभा को सामने लाने में काफी फायदेमंद साबित होते हैं। आज कई समाचार चैनलों के बड़े संवाददाता और संपादकीय पदों पर ऐसे लोग बैठे हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत स्ट्रिंगर के तौर पर की थी। दरअसल स्ट्रिंगर ही फील्ड के असली रिपोर्टर होते हैं, जो तमाम ऐसे स्रोतों से खबर निकाल सकते हैं, जहां समाचार एजेंसियों और दूसरे माध्यमों की पहुंच नहीं होती। अपने क्षेत्र से पूरी तरह वाकिफ होने के कारण वो क्षेत्र से जुड़ी किसी बड़ी घटना या चुनावी कवरेज के दौरान बारीकी से गहन जानकारियां भी मुहैया करा पाते हैं। इस तरह स्ट्रिंगर का काम अंशकालिक या फ्रीलांस न रहकर पूर्णकालिक होने लगता है। हालांकि कई स्ट्रिंगर ऐसे भी हैं, जिन्होंने तमाम चैनलों से एक साथ अपने संपर्क जोड़ रखे हैं, उनका उत्तरदायित्व किसी एक चैनल के प्रति नहीं होता और वीडियो फुटेज और बाइट वो एजेंसी या फ्रीलांसर के तौर पर सबको बेचकर कमाई कर लेते हैं। शायद ये स्थिति इसीलिए पैदा हुई है क्योंकि एक समाचार चैनल के लिए काम करके उन्हें अपने लिए पर्याप्त कमाई नहीं हो पाती है, या फिर वो ज्यादा से ज्यादा कमाई के लिए ये रास्ता अपनाते हैं। एक समय था, जब हरेक चैनल पर कैमरे के एंगल और फुटेज की शूटिंग क्वालिटी से ये पता लगाया जाता था कि कहीं ये फुटेज किसी और चैनल के पास तो नहीं या किसी और चैनल से चुराई गई तो नहीं। लेकिन अब ये अघोषित तौर पर माना जा चुका है कि सारा माल सबके पास उपलब्ध हो सकता है और सभी एक ही वक्त में अपने अपने स्क्रीन पर चल रही खबर और उनकी फुटेज को एक्सक्लूसिव बता सकते हैं। ऐसा संभवतः स्ट्रिंगर स्रोतों की स्थिति की वजह से ही हुआ है। अब चुंकि खबर में पिछड़ना कोई नहीं चाहता लिहाजा फुटेज इस्तेमाल करने की लालच में क्वालिटी और दूसरे मुद्दों की नुक्ताचीनी का सवाल भी नहीं उठता।
अब बात स्ट्रिंगर के रूप में करियर बनाने की चाहत रखनेवालों के लिए – भारत में समाचार चैनलों का कारोबार अपने संवाददाताओं के बजाय ज्यादातर स्ट्रिंगर्स के जरिए भले ही चल रहा हो, लेकिन स्ट्रिंगर्स प्रोफेशनल नहीं दिखते। सबसे पहले जरूरी ये है कि स्ट्रिंगर का काम करनेवालों में खबरों को पकड़ने की समझ हो और उनकी शूटिंग यानी कैमकॉर्डर के इस्तेमाल और कच्ची स्क्रिप्ट लिखने की क्षमता हो। पत्रकारीय नजरिए से देखें तो जिस किसी चैनल से वो जुड़े हों, उसके टार्गेट ऑडिएंश के हिसाब से खबरों की पहचान भी उन्हें होनी चाहिए। उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने के साथ साथ दूसरे पत्रकारों और संपादकों के संपर्क में भी रहने की आदत होनी चाहिए, ताकि खबरों के बारे में सलाह-मशविरा और विमर्श हो सके और अपनी खबरों को उनके सामने रखने, उन्हें बेचने की क्षमता भी उनमें होनी चाहिए। जिला मुख्यालयों, शहरों या कस्बों में काम करनेवाले स्ट्रिंगर्स से ये उम्मीद भी की जाती है कि वो इंटरनेट और कंप्यूटर के इस्तेमाल की जानकारी रखते हों, ताकि खबरों की स्क्रिप्ट और फीड आसानी से चैनल को भेज सकें। इसके लिए उन्हें अपने घर पर ही एक छोटा दफ्तर जरूर बना लेना चाहिए, जहां फोन, फैक्स और इंटरनेट की सुविधा हो, ताकि वो खबरों को चैनल तक भेजने का काम पूरा कर सकें। हालांकि फील्ड के स्ट्रिंगर आजकल गली मुहल्लों में मौजूद सायबर कैफे के जरिए भी इस काम को अंजाम दे डालते हैं। लेकिन कुछ बड़े स्तर पर और पेशेवर तरीके से काम करने के लिए एक दफ्तर का सेट-अप होना जरूरी है। अगर आप लंबे समय से स्ट्रिंगर का काम कर रहे हैं या स्ट्रिंगर बने रहना चाहते हैं तो आपके पास उन तमाम स्टोरीज़ के वीडियो टेप की लायब्रेरी होनी चाहिए, जो आप शूट कर चुके हों, ताकि उसका रिकॉर्ड रहे और भविष्य में भी उनका इस्तेमाल हो सके। कई बार कई दुर्लभ किस्म की फुटेज की अच्छी कीमत आपको मालामाल कर सकती है। आमतौर पर स्टोरी शूट करने में भी सावधानी बरतनी चाहिये कि वीडियो टेप बर्बाद न हों और उतनी ही फुटेज शूट की जाए, जितने की दरकार स्टोरी को हो सकती है। ये काम अभ्यास की बदौलत ही आता है, शुरुआत में बर्बादी तो लाजिमी है। खबरों पर आपकी नज़र होनी चाहिए और आइडियाज़ की तैयारी होनी चाहिए, जिन्हें आप चैनल के प्रभारियों के सामने समय-समय पर पेश कर सकें और अपना काम जारी रख सकें। स्टोरी का फोकस साफ होना चाहिए और उसमें चैनल की दिलचस्पी बने, इसके लिए उसकी संक्षिप्त रूप रेखा, बजट और शूटिंग में लगनेवाले वक्त की जानकारी जरूरत के मुताबिक देनी होगी। एक स्टोरी पर काम खत्म हो, इससे पहले अगली स्टोरी मंजूर हो चुकी हो, इसके लिए आपको लगातार चैनल के अधिकारियों के संपर्क में रहना पड़ेगा और आपके पास स्टोरीज़ के आइडिया आते रहें इसके लिए जरूरी ये है कि अपने क्षेत्र में आपके संपर्क मजबूत हों, संबंधित स्रोतों में आपकी जान-पहचान जबर्दस्त हो, और हर जगह लोग आपको जानते हों, ताकि कहीं भी कोई घटना हो, तो लोग सबसे पहले आपको खबर देने के लिए संपर्क करें। साथ ही खबर से जुडे लोगों को भी पकड़ने में आपको मशक्कत न करनी पड़े। ऐसी स्थिति में आपको सातों दिन चौबीसों घंटे खबर के लिए अपनी उपलब्धता बनाए रखनी होगी, अगर आप किसी और काम में या कारोबार में व्यस्त हों, तो खबर छूट सकती है या छोड़नी पड़ सकती है। खबरों का आपका कारोबार चलता रहे, उसमें कोई व्यवधान न आए, इसके लिए जरूरी ये है कि आप दूसरे चैनलों और दूसरे माध्यमों के भी संपर्क में रहें, ताकि आपकी हर स्टोरी कहीं न कहीं इस्तेमाल हो जाए। अगर आपमें पत्रकारीय गुण हैं, खबरों की समझ है काम करने का जोश और जज्बा है और तगड़े संपर्क हैं, तो स्ट्रिंगर होते हुए आपको किसी चैनल की पहचान की जरूरत नहीं होगी और आपको पत्रकार के रूप में ही जाना पहचाना जाएगा। दरकार इस बात की भी है कि खबरों की दुनिया में रहते हुए आप पत्रकारिता के मूल्यों को समझें और उसके प्रतिमानों को बरकरार रखें, न कि उसे निहित स्वार्थों और कमाई का साधन बनाकर काम करें। तभी आप अपने काम और पेशे के साथ न्याय कर सकेंगे।
-कुमार कौस्तुभ
23.04.2013, 5.45 PM