पत्रकार, सरोकार और उपन्यासकार
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पत्रकार जब अपराध, राजनीति, पुलिस, अदालत और समाज के अंधेरे पक्ष को वर्षों तक करीब से देखते हैं, तो वे केवल सामाजिक और नागरिक सरोकारों से जुड़ कर खबरें ही नहीं लिखते और प्रसारित करते हैं, बल्कि वे अनगिनत कहानियों, पात्रों और रहस्यों से भी सुपरिचित हो जाते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में कई पत्रकार आगे चलकर क्राइम थ्रिलर और जासूसी उपन्यासकार बन गए। पत्रकारिता उन्हें वास्तविक घटनाओं से रूबरू करवाती है और साहित्य उन्हें उन घटनाओं को रोमांचक कथा में बदलने का अवसर देता है। इस प्रकार पत्रकारिता से क्राइम थ्रिलर साहित्य तक की यात्रा एक स्वाभाविक रचनात्मक यात्रा बन जाती है। कहा जा सकता है कि पत्रकारिता कई बार क्राइम थ्रिलर साहित्य की प्रयोगशाला की तरह काम करती है—जहाँ वास्तविक घटनाएँ विस्तार से लेखन के लिए कच्चा माल देती हैं और साहित्य उन्हें रोमांचक कहानी में बदलने का अवसर देता है।
दुनिया में ऐसे पत्रकार-उपन्यासकारों की कमी नहीं है। इनमें सबसे प्रसिद्ध नामों में Stieg Larsson, Michael Connelly जैसे लेखक शामिल हैं। Stieg Larsson एक खोजी पत्रकार थे और बाद में उन्होंने “Millennium” सीरीज़ लिखी, जिसमें The Girl with the Dragon Tattoo, The Girl Who Played with Fire और The Girl Who Kicked the Hornets’ Nest जैसी प्रसिद्ध किताबें शामिल हैं। Michael Connelly पहले क्राइम रिपोर्टर थे और उन्होंने “Harry Bosch” डिटेक्टिव सीरीज़ लिखी, जिनमें The Black Echo, The Concrete Blonde, The Last Coyote जैसी किताबें प्रसिद्ध हैं। इन लेखकों के उपन्यासों में अपराध की दुनिया का यथार्थ, पुलिस जांच की बारीकियाँ और अपराधियों का मनोविज्ञान बहुत वास्तविक लगता है, क्योंकि यह सब उनके पत्रकारिता अनुभव से आया।
भारतीय संदर्भ में भी कई पत्रकार क्राइम थ्रिलर और जासूसी उपन्यास लिखने लगे हैं। इन समकालीन लेखकों में संजीव पालीवाल का नाम प्रमुख है, जिन्होंने नैना और पिशाच जैसे हिंदी क्राइम थ्रिलर उपन्यास लिखे। उनके उपन्यासों में मीडिया, राजनीति और अपराध का मिश्रण दिखाई देता है। इसी तरह मनोज राजन त्रिपाठी ने लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद कोड काकोरी और अंसारी मसारी जैसे अपराध-आधारित उपन्यास लिखे, जिनमें उत्तर प्रदेश के अपराध-राजनीति तंत्र की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। अंग्रेजी भाषा में शैलेन्द्र झा ने Press 9 for a Crime नामक क्राइम थ्रिलर लिखा, जो साइबर अपराध और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क पर आधारित है। इसी क्रम में अब पीयूष पांडे का नाम भी उल्लेखनीय है, जो पत्रकारिता से जुड़े रहे और कई उपन्यास लिखने के बाद अपराध और थ्रिलर लेखन की ओर आए।
ऐसे पत्रकार-लेखकों की विशेषता यह होती है कि वे अपराध की दुनिया को केवल कल्पना से नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभव, घटनाओं, पुलिस-प्रक्रिया, मीडिया-राजनीति संबंध और समाज की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर लिखते हैं, इसलिए उनकी कहानियाँ अधिक यथार्थवादी और विश्वसनीय लगती हैं।
पहले से कई पत्रकार नॉन फिक्शन श्रेणी में पुस्तकें लिख चुके हैं। जबकि अब वे उपन्यास लेखन में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ये पत्रकार-से-उपन्यासकार बने लेखक हिंदी के लोकप्रिय जासूसी और क्राइम उपन्यासकारों—जैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा—जैसी जगह साहित्य की दुनिया में बना सकते हैं। सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा ने दशकों तक लगातार लिखकर हिंदी पल्प फिक्शन और जासूसी साहित्य में बहुत बड़ा पाठक वर्ग बनाया। उनकी सफलता का कारण केवल अपराध कहानी नहीं, बल्कि तेज गति, सस्पेंस, रोचक भाषा, मजबूत पात्र और बहुत अधिक लेखन था। उन्होंने अपने पात्रों की श्रृंखलाएँ बनाई और पाठकों को लगातार नई कहानियाँ दीं।
पत्रकार से उपन्यासकार बने नए लेखकों के पास वास्तविक अपराध जगत का अनुभव और यथार्थवादी कथानक की ताकत है, जबकि पारंपरिक जासूसी लेखकों के पास कहानी कहने और मनोरंजन की असाधारण क्षमता थी। यदि ये नए लेखक लगातार लिखें, लोकप्रिय शैली अपनाएँ, अपने स्थायी पात्र बनाएँ और बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचें, तो भविष्य में वे भी हिंदी क्राइम थ्रिलर साहित्य में बहुत बड़ी जगह बना सकते हैं। संभव है कि आने वाले समय में हिंदी क्राइम साहित्य दो धाराओं में विकसित हो—एक पल्प जासूसी परंपरा (जैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा) और दूसरी यथार्थवादी क्राइम थ्रिलर परंपरा (पत्रकार-लेखक)।
अब यह तो समय ही बताएगा कि यह नई धारा कितनी प्रवाहमय होकर आगे बढ़ती है और हिंदी समाज को नये लेखकों से परिचित करवाती है।
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