Friday, April 19, 2013

न्यूज़ रूम बनाम ‘वॉर रूम’




न्यूज़ रूम – यानी खबरों की फैक्ट्री। टेलीविजन समाचार की दुनिया में खबरों का केंद्र होता है न्यूज़ रूम। ये वो जगह है जहां खबरें सबसे पहले आती हैं और फिर उन्हें प्रसारण के लिए तैयार किया जाता है। इस मायने में समाचार चैनलों में कामकाज का वो केंद्र होता है जहां संपादक, पत्रकार, संवाददाता, प्रोड्यूसर और समाचार प्रसारण से जुड़े तमाम कर्मचारी खबरों को जमा करने और उन्हें तराशकर प्रसारित करने का काम करते हैं। इस लिहाज से ये टेलीविजन चैनल में सबसे ज्यादा गहमागहमी वाला इलाका होता है जिसका क्षेत्रफल किसी बड़े हॉल के बराबर हो सकता है। शानदार लाइटिंग और एयरकंडिशनिंग वाले किसी शीशमहल के एक ही फ्लोर पर चंद बंद और पचासों खुले केबिन, सैकड़ों की संख्य़ा में कंप्यूटर वर्कस्टेशन, और इतने ही टेलीविजन स्क्रीन्स के अलावा हर एंगल से तस्वीरें लेनेवाले कैमरों से सज्जित हॉल आजकल आधुनिक न्यूज़ रूम की रूपरेखा पेश करते हैं। बाहर से देखने पर समाचार चैनल का ये हिस्सा जितना चमकदार और आकर्षक लगता है, अंदर जाने पर भी स्थिति देखने में वैसी ही होती है, लेकिन कामकाज के मायने में ये जगह सबसे ज्यादा डायनेमिक होती है, इसमें दो राय नहीं। इसका सबसे बढ़िया नज़ारा ब्रेकिंग न्यूज़ की स्थिति में देखा जा सकता है, जब चैनल के हर विभाग के स्टाफ खबर के पीछे भागते नज़र आते हैं और खबर को प्रसारण के अंजाम तक सबसे पहले पहुंचाने के लिए पूरे जोश के साथ जोर-शोर से लगे होते हैं। ऐसे हालात में भारतीय चैनलों के न्यूज़ रूम में शोर-शराबा भी आम बात है।
समाचार प्रसारण की दुनिया में न्यूज़ रूम का सिद्धांत पश्चिमी देशों के समाचार संगठनों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी की देन है। वैसे तो ये भी माना जाता है कि न्यूज़ रूम का सिद्धांत जनसंपर्क माध्यमों की उपज है, जहां से खबरों को खबरनवीसों तक पहुंचाने का काम किया जाता था। लेकिन मौजूदा दौर में व्यावहारिक तौर पर देखें तो समाचारों की संपादकीय व्यवस्था और तकनीकी सुविधाओं में तालमेल बिठाने के लिए न्यूज़ रूम की शुरुआत मानी जा सकती है। यूं तो न्यूज़ रूम भी समाचार चैनल के दफ्तर का वैसा ही एक हिस्सा है जैसे अखबारों के दफ्तर होते हैं। लेकिन रोजमर्रा के कामकाज के लिहाज से आधुनिक समाचार चैनलों के न्यूज़ रूम को इस तरीके से डिज़ाइन किया जाता है ताकि खबरों के प्रवाह और उनके प्रसारण का सिस्टम सरल रेखा में गतिशील हो। अखबारों में इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन न्यूज़ की घुसपैठ से अब न्यूज़ रूम की रूपरेखा कमोबेश एक जैसी दिखती है, लेकिन टेलीविजन चैनलों के न्यूज़ रूम में फर्क ये होता है कि वहां ऑडियो-वीडियो संपादन, प्रसारण के कंट्रोल रूम और स्टूडियो से हर पल सीधा संपर्क रहता है, जबकि अखबारों में प्रिंटिंग का काम एक समय सीमा के बाद का है और इससे हरेक कर्मचारी का मतलब नहीं होता। समाचार चैनलों में हर स्टाफ किसी न किसी तरीके से प्रसारण से जुड़ा होता है, लिहाजा न्यूज़ रूम में सबकी सक्रियता एकसमान रूप से देखी जा सकती है। हालांकि समाचार चैनल के संगठन और प्रबंधन के मुताबिक न्यूज़ रूम में कर्मचारियों और अधिकारियों की hierarchy होती है औऱ इसी के मुताबिक अलग-अलग स्तर पर काम होता है।  न्यूज़ रूम में आमतौर पर समाचार चैनल के संपादकीय़ विभाग से जुड़े लोगों के काम करने का इंतजाम होता है। यहां चैनल के एडिटर इन चीफ और मैनेजिंग एडिटर से लेकर प्रोड्यूसर्स और ट्रेनी और इंटर्न्स –सभी कांम में जुटे देखे जा सकते हैं। इस तरीके से अगर समाचार चैनलों की संपादकीय व्यवस्था पर नज़र डालें तो क्रम कुछ ऐसा बनता है-
                   एडिटर इन चीफ / मैनेजिंग एडिटर
                                ।---------------।
एग्जेक्यूटिव एडिटर      टेक्निकल हेड
        ।               ।-कैमरा/वीडियोएडिटिंग/साउंड/फीड
एसाइनमेंट हेड/ इनपुट एडिटर--------------आउटपुट/ न्यूज़ एडिटर/ एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर
।                                               ।
एडिटर-------एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर     एसोसिएट एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर
।                 ।                             ।
कॉरेसपोंडेंट/ रिपोर्टर/एंकर  सीनियर प्रोड्यूसर/ शिफ्ट इंचार्ज       सीनियर प्रोड्यूसर/ शिफ्ट इंचार्ज                          ।                             ।
            एसो. एडिटर/ प्रोड्यूसर      प्रोड्यूसर/स्क्रिप्ट/पैकेजिंग स्टाफ
                  ।                             ।
सहायक प्रोड्यूसर/ प्रोडक्शन एग्जेक्यूटिव/ ट्रेनी   एसि.प्रोड्यूसर/ प्रोडक्शन एग्जेक्यूटिव/ ट्रेनी

      टेलीविजन समाचार चैनलों का न्यूज़ रूम एक बड़ा वर्कप्लेस होते हुए भी कई हिस्सों में बंटा दिखता है। दरअसल ये आधुनिक दफ्तरी कार्यप्रणाली के प्रबंधन का असर है जिसके तहत काम का बंटवारा अलग-अलग विभागों, जिन्हें चैनल में डेस्क के नाम से जानते हैं, को सौंप दिया जाता है। मसलन रिपोर्टिंग डेस्क खबरें जुटाने का काम करता है, तो एसाइनमेंट डेस्क उन्हें न्यूज डेस्क तक पहुंचाने का। न्यूज़ डेस्क से जुड़ा कॉपी डेस्क खबरों की स्क्रिप्टिंग का काम देखता है, तो पैकेजिंग डेस्क से जुड़े लोग उनकी ऑडियो-वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया पूरी करते हैं। रिपोर्टिंग से भी जुड़े कई डेस्क होते हैं- राष्ट्रीय मसलों से जुड़ी खबरों के लिए नेशनल ब्यूरो और पॉलिटिकल डेस्क, अपराध की खबरों के लिए क्राइम डेस्क, महानगरों के लिए मेट्रो डेस्क, मनोरंजन की खबरों का जिम्मा एंटरटेनमेंट डेस्क पर होता है, तो बिजनेस से जुड़ी खबरें बिजनेस डेस्क और खेल से जुड़ी खबरें स्पोर्ट्स डेस्क देखता है। इसके अलावा एक रिसर्च डेस्क भी होता है, जो एक तरफ सभी विभागों को किसी भी जरूरी मुद्दे पर शोध-सामग्री मुहैया कराता है, तो साथ ही तमाम समाचार चैनलों की मॉनिटरिंग भी करता है, ताकि ये पता लगाया जा सके कि कौन सी खबर किस चैनल ने उठाई, हमने उठाई, कहां हम आगे रहे और कहां पिछड़े, किन चैनलों पर प्राइम टाइम में कौन सी खबरों को प्रमुखता दी गई। एसाइनमेंट डेस्क जहां एक ओर अलग-अलग रिपोर्टिंग डेस्क की खबरों को न्यूज़ डेस्क को सौंपता है, वहीं दूसरी एजेंसियों और स्रोतों से आनेवाले समाचार का भी प्रबंधन करता है। इसके अलावा हर दिन कौन सी प्रमुख खबरों के प्रसारण की तैयारी होगी और आनेवाले दिन का क्या एजेंडा होगा, ये भी एसाइनमेंट डेस्क की मार्फत ही तय होता है। एसाइनमेंट डेस्क तमाम ब्यूरो के संपर्क में रहता है और खबरों से जुड़े सीधे प्रसारण और कवरेज के लिए कैमरा यूनिट और आउटडोर ब्रॉडकास्टिंग वैन इत्यादि को भी तैनात करने और उनके प्रबंधन का जिम्मा एसाइनमेंट डेस्क पर ही होता है। इसके अलावा एसाइनमेंट डेस्क न्यूज़ डेस्क की ओर से किसी खास खबर पर मांगी गई इनपुट सामग्री मुहैया कराने का भी इंतजाम करता है। खास खबरों पर खास कार्यक्रमों की तैयारी के लिए न्यूज़ डेस्क से ही जुड़ा स्पेशल डेस्क भी कई चैनलों में बनाया जाता है, साथ ही आम चुनाव, बजट और कई हफ्ते चलनेवाली खास घटनाओं को लेकर भी समय-समय पर खास डेस्क बनाए जाते हैं और विशेषज्ञ जानकार पत्रकारों और समाचार कर्मियों को वहां तैनात किया जाता है।
समाचार चैनलों में न्यूज़ रूम साल के 365 दिन, सातों दिन , चौबीसों घंटे चालू रहता है, यहां शिफ्टों में काम होता है और कामकाज के बंटवारे और शिफ्ट की जरूरतों के मुताबिक संपादकों से लेकर नीचे तक के स्टाफ की संख्या निर्धारित होती है जिन पर रोजाना के कामकाज को अंजाम देने की तैयारी होती है। हर आनेवाले दिन के लिए एक दिन पहले डे प्लान बनाने की परंपरा है, जिसमें अगले दिन की प्रमुख खबरों की कवरेज और एजेंडे का जिक्र होता है और इसके साथ ही ये तय हो जाता है कि अगले 24 घंटों के लिए मोटामोटी किस तरह से बुलेटिन और कार्यक्रमों की तैयारी करनी है, किन खबरों को कितना महत्व देना है, किस तरह कवरेज होनी चाहिए। लेकिन हमेशा ये पहले से तय नहीं होता कि खबर कब और कहां से आएगी। ऐसे में असलियत में कोई खबर आने पर कितनी तेजी से उस पर काम होता है, यही तय करना न्य़ूज़ रूम की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है और यही सबसे बड़ी चुनौती भी होती है कि अपनी संपादकीय नीतियों के दायरे में किस खबर को किस तरीके से पेश करना है, कौन सी खबर बड़ी है और उसे कितना विस्तार दिया जा सकता है। इस सिलसिले में तैयारी के लिए अमूमन हरेक समाचार चैनल में रोजाना सुबह 11 बजे तक संपादकों और वरिष्ठ स्टाफ की बैठक होती है जिसमें दिन की खबरों के मुताबिक प्राइम टाइम और रात तक के बुलेटिन और कार्यक्रमों का एजेंडा तय किया जाता है। संचार माध्यमों का काफी विकास हो चुका है और अगर तमाम जरूरी लोग एक साथ एक जगह न मिल सकें, तो अब मोबाइल फोन और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए भी बैठकें आसान हो गई हैं। ऐसे में इस तरह की बातचीत फोन और कांफ्रेंसिंग के जरिए भी हो जाती है और न्यूज़ रूम का कामकाज सुचारू रूप से चलता रहता है। ऐसी बैठकें दोपहर और शाम के वक्त भी होती हैं जिनमें विकसित हो रही खबरों और आनेवाली खबरों के एजेंडे पर विचार होता है। समाचार चैनलों में एजेंडा तय करने की ये शैली काफी हद तक उस वॉर रूम के सिद्धांत से मेल खाती है, जहां सेना के जनरल अपने कारिंदों के साथ बैठकर रणनीति बनाते हैं। खबरों की दुनिया में भी गलाकाट जंग रोजाना चलती रहती है इसलिए समाचार चैनलों के रणनीतिकार भी केबिन में रोजाना अपनी बैठकों के दौरान खबरों से खेलने की रणनीतिय़ां तय करते रहते हैं। नए आइडियाज़ पर बात होती है। किसी खबर के क्या-क्या एंगल होंगे, उसकी ब्रैंडिंग क्या होगी, खबर से जुड़े कार्यक्रमों के शीर्षक क्या होंगे, उन पर कहां-कहां से इनपुट आएगा, किन विशेषज्ञों से उस पर चर्चा होगी, खबर पर बातचीत के लिए कौन से लोग मेहमान के तौर पर स्टूडियो में बुलाए जा सकते हैं- इन तमाम मुद्दों पर बनी रणनीतियों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए न्यूज़ रूम के एक कोने से दूसरे कोने तक तमाम स्टाफ सक्रिय देखे जा सकते हैं। समाचारों का निर्माण और प्रसारण सतत प्रक्रिया है, लिहाजा न्यूज़ रूम के स्टाफ को चैन कहां- एक खबर को अंजाम तक पहुंचाया , तो दूसरी खबर आ गई और उस पर काम शुरु..ये प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। कोई भी स्टाफ लगातार चौबीस घंटे काम नहीं कर सकता , इसलिए फैक्ट्रियों की तरह ही न्यूज़ रूम में शिफ्टों में काम कराने की व्यवस्था है ताकि बचा हुआ और आगे का काम अगली शिफ्ट के स्टाफ देखें और आगे की तैयारी करें, हैंडओवर-टेकओवर की व्यवस्था हरेक शिफ्ट के शुरु और अंत में लागू होती है और तमाम बातें रिकॉर्ड में दर्ज रहें, कोई जरूरी बात मिस न हो जाए, इसलिए आंतरिक ई-मेल के जरिए न्यूज़ ग्रुप में उन्हें सर्कुलेट करने की भी परिपाटी है। न्यूज रूम के अलग-अलग विभागों के बीच भी ई-मेल के जरिए ही जानकारियों के आदान-प्रदान और जरूरी मुद्दों पर वार्तालाप की प्रक्रिया है, ताकि हर दफ्तरी मामले का लिखित रिकॉर्ड मौजूद रहे और हर आदमी की जवाबदेही तय रहे। न्यूज़ रूम की ये पूरी व्यवस्था किसी लिखित किताबी ज्ञान का परिणाम नहीं है, बल्कि आधुनिक तकनीकी और संचार सुविधाओं के विकास और इस्तेमाल से हासिल अनुभव के जरिए ये व्यवस्था बनाई गई है जिसमें निरंतर सुधार और बदलाव की गुंजाइश रहती है।                           
भारत में पिछले तीन-चार दशकों में टेलीविजन समाचार प्रसारण के विकास के साथ ही संपादकीय व्यवस्था में भी काफी बदलाव आए हैं और इसका सीधा असर टेलीविजन न्यूज़ रूम पर देखा जा सकता है।  खास कर कंप्यूटरों और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ने से एक तरफ जहां कर्मचारियों की क्षमता के उपयोग में बदलाव आए हैं, वहीं काम काफी हद तक आसान होते जा रहे हैं। पहले जहां कई काम के लिए अलग-अलग लोग रखे जाते थे, वहीं अब एक कर्मचारी अकेले कई काम करने में सक्षम पाया जाता है। कामकाज निपटाने में लगनेवाला समय भी काफी घट गया है जिससे तय डेडलाइन में खबर से जुड़ी चीजों की तैयारी आसान हो गई है। स्मार्टफोन और इंटरनेट आधारित टैबलेट कंप्यूटरों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही न्यूज़ रूम का दायरा भी अब सिमटने लगा है और ऐसा वक्त भी आते देर नहीं लगनेवाली है जब न्यूज़ रूम की  वॉर रूम जैसी रणनीति बनाने की व्यवस्था हथेलियों पर पड़े फोन और टैबलेट पर निर्भर हो जाए। अमेरिकन जर्नल्जिम रिव्यू के लेख Reinventing the Newsroom  में इस स्थिति की चर्चा की गई है और इसके पड़नेवाले असर के बारे में कहा गया है-
‘Some journalists are already talking about the "virtual newsroom," where reporters and editors connect electronically and don't even need a place to gather. Other editors foresee the newsroom as a giant information factory, turning out material not just for a newspaper but for specialty publications, audio text, faxes, cable broadcasts, databases and who-knows-what else.’[1]

इसके बावजूद समाचार प्रसारण की व्यावहारिक प्रणाली को अंजाम देने के लिए न्यूज़ रूम का दफ्तरी रूप चलन में रहेगा बल्कि इसका और विकास होगा और ये समाचार प्रसारण केंद्र की महती भूमिका अदा करने लगेगा। अभी भी कई समाचार चैनलों के बुलेटिन आधारित कार्यक्रमों के दौरान न्यूज़-रूम से खबरों के सीधे प्रसारण देखने को मिलते हैं, जिनमें आम दर्शक न्य़ूज़ रूम मे काम कर रहे लोगों की झलक देख सकते और अपने मन में एक छवि बना सकते हैं कि आखिर समाचार चैनलों के न्यूज़ रूम कैसे होते हैं, लेकिन कैमरे के जरिए टीवी स्क्रीन पर जो दिखता है, वो सिर्फ झलक भर है, पूरी खबर तो न्यूज़ रूम के उन तमाम हिस्सों में छिपी रहती है, जो कैमरे की जद में नहीं आते। न्यूज़ रूम समाचार चैनल का ऐसा हिस्सा है, जहां चौबीसों घंटे बात सिर्फ खबरों की होती है, बाकी गॉशिप या दूसरे मुद्दे चाय की दुकानों पर या कैंटीन में डील किए जाते हैं। खबरों के माहौल में खबरों की चर्चा सार्थक है और ये स्टाफ के वक्त का सदुपयोग भी है।
न्यूज़ रूम की व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा है खबरों से जुड़े फैसले लेने का। न्यूज़ रूम के बड़े अधिकारी हमेशा यहां मौजूद नहीं रहते, लिहाजा शिफ्ट प्रभारियों पर खबरों के प्रसारण और ट्रीटमेंट के फैसले लेने की जिम्मेदारी होती है। आम तौर पर वो इसके लिए अधिकृत भी होते हैं, लेकिन कुछ मौके ऐसे भी आते हैं, जब वरिष्ठ संपादकीय प्रमुखों की हरी झंडी मिले बगैर खबर ऑन एयर नहीं की जा सकती। ये एक उदाहरण भर है सिर्फ ये बताने के लिए कि न्यूज रूम की व्यवस्था कितनी सरल और पारदर्शी हो। या तो हर एक खबर के बारे में हमेशा प्रमुख संपादकीय सहयोगियों का निर्देश कार्यकारी स्टाफ को मिलता रहे, या फिर उनके विवेक पर भरोसा बनाए रखा जाए। मौजूदा दौर में भारतीय समाचार चैनलों के तमाम प्रमुख संपादकीय अधिकारी इस मामले में दोनों ही तरह की स्थिति लेकर चलते दिखते हैं। अब जमाना बुजुर्ग संपादकों का नहीं है। अधिकतर संपादकीय प्रमुख युवा पीढ़ी से आते हैं जिनकी खबरों के प्रति पैशन, उसकी भूख इतनी तेज़ है और खबरें सूंघने का , उन्हें पकड़ने का अनुभव इतना गहरा है कि वो एक तरफ तो ज्यादातर वक्त दफ्तर में ही गुजारते दिखते हैं और 24X7 वक्त फोन पर जरूर उपलब्ध होते हैं । ऐसे में जूनियर कर्मचारियों का काम आसान रहता है, लेकिन साथ ही उन्हें खबरों के बारे में अपनी राय भी देने की आजादी रहती है, जिससे एडिटोरियल जजमेंट में सुविधा होती है। न्यूज़ रूम में अलग-अअलग विभागों में काम बांटकर जिम्मेदारी तय़ कर दी जाती है, ऐसे में संपादकीय प्रमुख के लिए खुद हर पहलू पर पैनी और सरसरी नजर रखने की जरूरत होती, उसमें खुद को पूरी तरह शामिल करने की नहीं। अमेरिकन जर्नलिज्म रिव्यू के लेख Reinventing the Newsroom में इस स्थिति की चर्चा की गई है और कहा गया है कि नए तरीके के न्यूज़ रूम की व्यवस्था की शुरुआत कुछ इस तरह से हो सकती है- ‘Leaders will set direction and try to create the culture for change. Newspeople will run the newsroom.’ [2]मैनपॉवर और संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल हो सके इसके लिए जरूरी है हर स्टाफ की क्षमता के मुताबिक उससे काम लिया जाए। कमजोर स्टाफ की क्षमता बढ़ाने के लिए विभागों में परिवर्तन और ड्यूटी की विविधता पर ध्यान दिया जा सकता है। वहीं , ऊर्जावान स्टाफ की क्षमताओं का सदुपयोग भी उन्हें नए-नए मौके देकर किया जा सकता है। अखबारों में ऑनलाइन एडिशन का चलन शुरु होने पर न्यूज़ रूम की व्यवस्था में कुछ इस तरह के बदलाव आए हैं। वहां काम करनेवालों की भूमिका बड़ी होने लगी है। वहां एक संपादकीय प्रमुख नीतियां बनाने और लागू करने का काम करता है, तो उसके दो वरिष्ठ सहयोगी कामकाज पर नजर रखने का। और कामकाज को अंजाम देने के लिए विशेषज्ञ पत्रकार हर डेस्क पर मौजूद होते हैं, जो अपने कनिष्ठ सहयोगियों से काम पूरे करवाते हैं टीम लीडर की भूमिका में। टेलीविजन न्यूज रूम में भी नई तकनीक और कंप्यूटर आधारित ऑटोमेशन सिस्टम लागू होने से कुछ ऐसी ही व्यवस्था देखने को मिल रही है। लेकिन अखबार के मुकाबले टेलीविजन प्रसारण का फलक बड़ा होता है लिहाजा इसमें जटिलताएं भी कम नहीं हैं। बेहतरीन स्थिति तभी देखने को मिल सकती है जब पूरा का पूरा स्टाफ पूरी तरह अपनी जिम्मेदारियों को समझे औ उनका निर्वाह करे। न्यूज़ रूम में अगर भीड़ ज्यादा है और स्टाफ लापरवाह, तो अच्छे नतीजे नहीं देखने को मिलेंगे। कम स्टाफ में भी काम को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया जा सकता है, बशर्ते स्टाफ काम का जानकार हो और काम के प्रति समर्पित हो। ये न्यूज रूम की आदर्श स्थिति है, जो अक्सर देखने को नहीं मिलती। ऐसे में न्यूज़ रूम खबरिया रणनीति बनाने वाले वॉर रूम से अलग हटकर ऐसी जंग का मैदान बनने लगता है, जहां सहयोगियों के बीच कामकाज को लेकर ही तनाव बढ़ता है औऱ वैमनस्य की स्थिति पैदा होती है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में भी ऐसे तनाव और वैमनस्य आम बात हैं, लेकिन स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल रहे, तो फायदा संगठन को और न्यूज रूम को ही होगा।
-          कुमार कौस्तुभ
19.04.2013. 6.00 PM




[2] http://www.ajr.org/Article.asp?id=1677

Thursday, April 18, 2013

हेडलाइन की डेडलाइन




हेडलाइन का मतलब है प्रमुख समाचार। टेलीविजन में ये जुमला अखबार से ही आया है। लेकिन माध्यम अलग होने की वजह से इसका स्वरूप अलग है और पेश करने के तरीके भी। आम तौर पर सभी समाचार चैनलों में प्रमुख समाचार बुलेटिन्स या कार्यक्रमों की शुरुआत में दिखाए जाते हैं और कोशिश ये होती है कि घड़ी की सुई के साथ ही हेडलाइन भी समय पर टीवी स्क्रीन पर हिट हों। लिहाजा हेडलाइन की डेडलाइन हर आधे घंटे की शुरुआत में तय रहती है और इसी के हिसाब से बुलेटिन प्रोड्यूसर्स को अपनी तैयारी करनी होती है। ऐसे में बड़ी सावधानी और सजगता के साथ साथ तेजी से दिमाग के इस्तेमाल की क्षमता भी जरूरी है।
टेलीविजन समाचार के रोज बदलते दौर में हेडलाइन की परंपरा ही शायद सबसे पुरानी है, जो अब तक चली आ रही है। हेडलाइन्स के प्रसारण का ढर्रा बंधा-बंधाया है और इसके ढांचे में बदलाव की गुंजाइश आमतौर पर नहीं दिखती। लेकिन हरेक समाचार चैनल पर इसे अलग तरीके से पेश करने की कोशिश होती है। ये बदलाव ग्राफिक्स और म्यूजिक के स्तर पर सबसे ज्यादा दृष्टिगोचर होते हैं। कहीं स्क्रीन पर फुल फ्रेम तस्वीरों और इंट्रो पट्टी के साथ हेडलाइन खबरें दिखाई जाती हैं तो किसी चैनल पर आकर्षक बॉक्स में। हेडलाइंस के जरिए जैसे समय विशेष की सबसे बड़ी और प्रमुख खबरों का गुलदस्ता पेश किया जाता है। कुछ इसी मानसिकता के तहत हेडलाइंस के ग्राफिक्स भी बड़े आकर्षक बनाए जाते हैं और इनमें आमतौर पर वही म्यूजिक़ भी इस्तेमाल किया जाता है, जो चैनल का सिग्नेचर ट्यून हो। हालांकि कुछ टीवी चैनलों पर हेडलाइन्स के साथ धमाकेदार और तेज़ म्यूजिक पेश करने की भी परंपरा है, जिसका मकसद दर्शकों को इसकी धमक से रू-ब-रू करवाना होता है।
हेडलाइंस सिर्फ प्रमुख खबरों का गुलदस्ता भर ही नहीं होते, ये आनेवाले बुलेटिन की झलक भी पेश करते हैं। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि जिन खबरों को हेडलाइन में शामिल किया गया है, उन्हें बुलेटिन में जरूर विस्तार से दिखाया जाएगा। ऐसे में हेडलाइन के जरिए भी दर्शकों को बांधने की कोशिश होती है। हालांकि टेलीविजन समाचार के कुछ दिग्गजों का ये भी मानना है कि हेडलाइन के जरिए भी खबर ही पेश की जाती है, तो जिन खबरों को हेडलाइन में लिया गया है, उनको फिर से बुलेटिन में दोहराने का कोई औचित्य नहीं। लेकिन ये तर्क आमतौर पर चुनिंदा एक-दो खबरों पर लागू हो सकता है, जब बुलेटिन में खबरों को विस्तार से दिखाने के लिए समय की कमी हो। ऐसे में ये मान लिया जाता है कि जो खबर हेडलाइन में ले ली गई, वो बुलेटिन प्रोड्यूसर से अछूती नहीं रही यानी उसे चैनल पर रजिस्टर कर लिया गया है। आजकल 10 बड़ी खबरों के ढांचे में भी हेडलाइन दिखाने का रिवाज शुरु हो चला है, ऐसे में हेडलाइंस खुद भी संक्षिप्त बुलेटिन का स्वरूप अख्तियार करने लगी हैं जिससे खबरों को आगे फिर से उसी रूप में बगैर किसी अतिरिक्त जानकारी या वैल्यू एडिशन के ही दिखाना, उन्हें चंद मिनटों के अंदर दोहराने जैसा ही लगता है, जिससे बचने की जरूरत महसूस की जाती है।  
हेडलाइंस में चुनिंदा सबसे बड़ी खबरें ही शामिल करने की परंपरा रही है, ऐसे में अमूमन 3 से लेकर 5 या 6 प्रमुख खबरों को प्राथमिकता के क्रम में चुन लिया जाता है। लेकिन किस खबर को प्राथमिकता क्रम में सबसे ऊपर रखा जाए और किसे नीचे- ये तय करना भी आसान नहीं है। चलन के मुताबिक, ऐसा माना जाता है कि हार्ड खबरें हेडलाइन में ऊपर हों और सॉफ्ट किस्म की खबरें नीचे। लेकिन हार्ड खबरों में किसी बड़े हादसे या हंगामा की खबर पहले रहेगी या फिर राजनीतिक घटनाक्रम या कारोबार से जुड़ी- ये तो खबर की सामयिकता से ही तय होगी। किसी घंटे अगर राजधानी में या मुंबई में किसी हादसे में 9 लोगों के मरने की ताजा खबर आए तो उसे हेडलाइन में सबसे पहले रखा जा सकता है और राजनीतिक दांव-पेंच से जुड़ी खबर नीचे जा सकती है। वहीं, अगर किसी बड़े ऐसे क्रिकेट मैच का नतीजा अभी अभी आया हो, जिसमें दर्शकों की दिलचस्पी ज्यादा हो, तो उसे पहली खबर बनाया जा सकता है, भले ही अगले घंटे वो पांचवीं खबर हो जाए। ऐसे में हेडलाइन के लिए खबरों का चयन काफी सूझ-बूझ और सोच-विचार से होना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में हेडलाइन की डेडलाइन नहीं भूलनी चाहिए, क्योंकि देर हुई, तो हेडलाइन ड्रॉप होने का खतरा रहता है। कई समाचार चैनलों पर हेडलाइन प्रायोजित होती हैं, लिहाजा उन्हें ड्रॉप करना चैनल के कारोबारी हित को प्रभावित कर सकता है, इसका ध्यान जरूर रखा जाना चाबिए।
हेडलाइन में खबरों की भाषा ऐसी रखी जाती है ताकि एंकर आसानी से, पूरी लय में और तेज गति में पढ़ सके। सामान्यतः हेडलाइन की पंक्ति सीधी-सपाट नहीं होती, उन्हें दो लाइनों में तोड़ा जाता है और भाषा में ऐसा मोड़ दिया जाता है, जिसमें तुकबंदी भी हो, और जो सुनने में अच्छी लगे और पूरी खबर भी जाहिर कर दे। पूरी खबर को 2 लाइन में समेटना भी बड़ी चुनौती है। हालांकि सही तौर पर देखें तो खबर सिर्फ एक ही लाइन की मानी जाती है, बाकी सब उससे जुड़ी जानकारियां होती हैं। लेकिन बड़ी जानकारी को भी हेडलाइन में खबर के तौर पर समाहित करने का लोभ अक्सर हेडलाइन लिखनेवाले नहीं छोड़ पाते, जिससे लाइन बड़ी होने का खतरा रहता है। वैसे एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ जैसे चुनिंदा चैनलों पर इन दिनों हेडलाइन को सीधी-सपाट भाषा में और तीन-चार लाइनों की स्क्रिप्ट में पेश करने का चलन दिख रहा है। इन हेडलाइन्स में खबरों से जुड़ी पट्टियां भी एक के बजाय दो-दो दिखती हैं। मकसद वही है, कि खबरों को पूर्ण रूप में पेश किया जाए। लेकिन ये चलन हेडलाइंस को सबसे अलग दिखाने के अलावा और किसी हद तक सफल नहीं दिखता क्योंकि अगर हेडलाइन के बाद बुलेटिन आनेवाला हो, या फिर खबरों पर आधारित ही कोई और कार्यक्रम , तो हेडलाइन की लाइन रिपीट होना लाजिमी है।  भारतीय समाचार टेलीविजन संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में प्रयोगों का सिलसिला जारी है। हेडलाइंस के निर्माण में भी एकाधिक प्रयोग बराबर दिखते हैं। इन प्रयोगों के तहत हेडलाइंस को हेडलाइंस कहने की परंपरा बदलने की भी होड़ दिख रही है। कुछ चैनल अभी भी हेडलाइन को हेडलाइन का ही शीर्षक देते हैं, तो कुछ चैनल ‘इस वक्त की बड़ी खबरें’, ‘बड़ी खबरें’, ‘प्रमुख खबरें’, ‘प्रमुख समाचार’, ‘बड़ी खबर’, ‘8 बजे की बड़ी खबरें’ जैसे अलग-अलग जुमलों से इसे परिभाषित करते दिखते हैं। मूल भावना एक ही है, लेकिन कलेवर बदले दिखते हैं।
हेडलाइंस में प्रमुख खबरें दिखाने के लिए छोटी पंक्तियों, सरल भाषा का इस्तेमाल होता है, और ग्राफिक्स में इस्तेमाल होनेवाले टेक्स्ट का आकार आम पट्टियों के टेक्स्ट के आकार से काफी बड़ा होता है। बड़े आकार वाले टेक्स्ट का चलन भी अखबार से उधार लिया गया है। जैसे अखबारों में पहले पन्ने पर सबसे ऊपर एक या दो हेडलाइंस के टाइटिल टेक्स्ट या हेडर बड़े फांट में लिखे जाते हैं, वैसे ही टीवी की हेडलाइंस को और खबरों से अलग करने के लिए बड़े फांट का इस्तेमाल होता है। लेकिन अखबारों में जहां रोज ये तय करने की छूट होती है कि आप हेडलाइन के रूप में एक ही खबर लें, या दो या तीन, वहीं, टेलीविजन समाचार में 3, 5 या 6 या 8 या 10 हेडलाइंस लेने का चलन है। सवाल है कि ऐसे में अगर कोई एक ही खबर घंटे की सबसे बड़ी खबर हो, तो दूसरी कम महत्व वाली खबरों को भला उसके साथ कैसे तोलेंगे और कैसे साथ बिठाएंगे या फिर क्या खबरिया नजरिए से हल्की खबरों को भी नंबर पूरे करने के लिए हेडलाइन में शामिल करने की मजबूरी बरकरार रहेगी? ऐसी समस्या अक्सर पेश आती है। ऐसे में दो स्थितियां पैदा होती हैं, एक तो ये जिसकी बात अभी हमने की यानी एक बड़ी खबर के साथ 4 और साइड की खबरें भी हेडलाइन में शामिल हों। वहीं दूसरी स्थिति ये भी है कि एक जो सबसे बड़ी खबर है, उसके महत्वपूर्ण हिस्सों को 2 या 3 या 5 बड़ी खबरों में बांटकर पांच हेडलाइंस का गुलदस्ता सिर्फ एक ही अहम खबर पर केंद्रित कर लें। विजुअल मिलते-जुलते होने और पट्टियों में खबर का सारांश होने से बड़ी खबर की बड़ी अहमियत भी बरकरार रहेगी और संतुलन बनाए रखने में भी कामयाबी मिलेगी। दोनों ही स्थितियों का प्रयोग अक्सर चैनलों पर दिखता है। लेकिन हेडलाइंस संतुलित हों, ऐसा हमेशा देखने को नहीं मिलता। ऐसा भी माना जाता है कि हेडलाइंस बुलेटिन का सार-संक्षेप होते हैं, उनकी झलक पेश करते हैं। लिहाजा बुलेटिन में शामिल किए जानेवाली हर प्रमुख खबर हेडलाइन में भी हो, इसके पक्ष में तर्क दिए जाते हैं, लेकिन खबरों की प्रासंगिकता औऱ ताजगी के लिहाज से ये तर्क फिट नहीं बैठता। किसी खबर से जुड़ा दिलचस्प आइटम बुलेटिन में चार चांद लगा सकता है, लेकिन हेडलाइन के लिहाज से वो बासी हो सकता है, इसका ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है। हेडलाइंस संतुलित रहें, इसके लिए ये जरूरी माना जाता है कि उनमें घंटे की सबसे बड़ी खबरों के साथ, राजनीति, मेट्रो, कारोबार, अंतरराष्ट्रीय, खेल और मनोरंजन से जुड़ी बड़ी खबरें भी शामिल हों। सुबह या रात के बुलेटिन्स की हेडलाइंस में इस तरह का संतुलन रखना जरूरी माना जाता है क्योंकि दर्शकों की जिज्ञासा हर क्षेत्र की खबर जानने में होती है। लेकिन हमेशा ऐसा करना संभव नहीं होता और समय और परिस्थितियों के मुताबिक खबर की प्रासंगिकता तय होती है जिससे हेडलाइंस भी निर्धारित होती हैं।
खबरों को तेजी से दिखाने की होड़ के इस दौर में हेडलाइंस भी समाचार पेश करने का एक अहम जरिया बन चुकी हैं। इनका मकसद सिर्फ प्रमुख खबरों को दिखाने तक ही नहीं सीमित है, वरन घंटे की सबसे ताजातरीन खबर को भी पेश करने का उद्देश्य इसके जरिए अक्सर पूरा किया जाता है, जबकि खबर का विंडो यानी बुलेटिन प्रसारित करने का स्लॉट नहीं होता या फिर बुलेटिन में जगह नहीं होती। जैसा कि हेडलाइन के शाब्दिक अर्थ से ही जाहिर है, इस ढांचे में किसी खबर को शामिल किए जाने का ही मतलब है कि उसकी अहमियत बढ़ जाती है। खबरिया नजरिए ये या किसी और वजह से किसी जानकारी को खबर बनाने के लिए भी कई बार उसे हेडलाइन में शामिल किया जाता है ताकि वो जानकारी खबरों से जुड़े लोग और आम दर्शकों की नजर पर चढ़े। ये बात कई बार प्लांटेड खबरों या सियासी बयानबाजी के मामले में किसी व्यक्ति विशेष को अहमियत देने के मामलों में भी देखी जाती है ऐसे में हेडलाइंस में दिखाई गई कोई खबर खबर के पैमाने पर कितनी खरी उतरती है, इसका अंदाजा दर्शक और मीडिया से जुड़े लोग खुद लगा सकते हैं।
समाचार चैनलों में हेडलाइंस लिखने का काम आमतौर पर न्यूज़ डेस्क के प्रभारी या वरिष्ठ जनों या फिर ऐसे लोगों पर होता है, जिनकी भाषा अच्छी और घुमावदार हो, और खबर पर बेहतरीन पकड़ हो। हेडलाइंस लिखने में भाषा के खेल का खास ख्याल रखना होता है, ताकि खबरें तेज़ तर्रार और धारदार तरीके से लय में पेश की जा सकें। यही बात हेडलाइंस की पट्टियों पर भी लागू होती है। चुंकि पट्टियों में शब्दों की सीमा होती है, लिहाजा दो से तीन शब्दों में पूरी खबर बयान करनी पड़ती है। यानी पूरे वाक्य की जगह चंद सार्थक जुमले इस्तेमाल करके खबर बताने की समझ हेडलाइन लिखनेवाले में होनी चाहिए। अभ्यास और दिमागी सजगता के जरिए ही हेडलाइंस लेखन पर पकड़ बनाई जा सकती है।  
टेलीविजन समाचार प्रसारण में समय की अहमियत सबसे ज्यादा है। यहां सब कुछ घड़ी के मुताबिक चलता है और किसी भी स्तर पर देर और लेटलतीफी बर्दाश्त नहीं की जाती। जैसा कि सभी जानते हैं, समाचार बुलेटिन्स और कार्यक्रमों के समय पहले से तय होते हैं और 24 घंटे की व्हील में एक के बाद एक तमाम बुलेटिन और कार्यक्रमों के प्रसारण की तैयारी होती है। आज के दौर में चुंकि ज्यादातर समाचार चैनलों पर सीधा प्रसारण यानी लाइव प्रसारण होता है, लिहाजा हरेक स्लॉट में समय का प्रबंधन काफी बड़ी चुनौती है। ऐसे में हेडलाइन समय पर पेश करना न्यूज़ डेस्क के सबसे अहम कामों में से एक है। टेलीविजन समाचार में हेडलाइंस तैयार करने का मतलब सिर्फ खबरों का टेक्सट लिखने और ग्राफिक्स की पट्टियां तैयार करने से ही नहीं है। हर खबर के साथ और हेडलाइन की भावना, उसके हर शब्द के हिसाब से उचित विजुअल भी दिखे इसका खास ख्याल रखना पड़ता है। यहां जिम्मेदारी पैनल कंट्रोल रूम की बढ़ जाती है, कि वो लाइन के मुताबिक विजुअल इस्तेमाल करें और न होने पर उसकी मांग करें। हालांकि समाचारों की भागमभाग में इसका ध्यान रख पाना अक्सर संभव नहीं होता, लिहाजा न्यूज़ डेस्क से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वो हेडलाइंस के हिसाब से विजुअल मुहैया कराएं। आजकल हेडलाइंस में कई प्रयोग हो रहे हैं। मसलन बयान पर आधारित खबर को सपोर्ट करने के लिए बयान के हिस्से चंद सेकेंड अपसाउंड करके सुनाना या फिर हंगामे या सॉफ्ट खबर में दिलचस्पी बढ़ाने वाले नेचुरल एंबिएंस को अपसाउंड करके इस्तेमाल करना। ये सारी प्रक्रिया पैनल कंट्रोल रूम की सक्रियता से साकार हो सकती है, बशर्ते उन्हें पहले से इसके लिए जरूरी निर्देश हों, या फिर वो अपने विवेक का उचित इस्तेमाल करें। हेडलाइंस में प्रयोगों का मकसद दर्शकों को खबरों से रू-ब-रू कराना और खबरों को प्रमोट करना भी है ताकि दर्शक हेडलाइन की खबर देखकर आगे उसे विस्तार से देखने के लिए रुक सके। ऐसे में हेडलाइंस में खबरों को चतुराई और इनोवेटिव तरीके से पेश करने की कोशिश होनी चाहिए। हेडलाइंस सिर्फ बुलेटिन का मुखड़ा भर नहीं होते, कई समाचार चैनलों में इन्हें खबरों के wrap up के लिए सार-संक्षेप के रूप में भी पेश किया जाता है मसलन –‘चलते-चलते अभी तब की बड़ी खबरें एक बार फिर देख लें’ – ऐसे में हेडलाइंस को समय-समय पर अपडेट किए जाने की जरूरत बढ़ जाती है। इसके लिए जरूरी है खबरों पर नजर बनी रहे, ताकि कोई भी अपडेट आए तो सबसे पहले उसे आनेवाली हेडलाइन में शामिल किया जा सके या कोई और बड़ी खबर आए तो उसे भी हेडलाइन में लिया जा सके। बुलेटिन का हिस्सा होते हुए भी हेडलाइन का अलग स्वरूप है, उससे जुड़ी दर्शकों की संवेदना भी है। हेडलाइंस में मामूली गलती या उसके बासी महसूस होने से दर्शकों पर उसका विपरीत असर पड़ सकता है और इसकी सीधी प्रतिक्रिया चैनल की छवि बना या बिगाड़ सकती है। ऐसे में हेडलाइंस के मामले में समझौतों से बचने की जरूरत है और खास सतर्कता होनी चाहिए।
-कुमार कौस्तुभ
18.04.2013, 5.00 PM

Wednesday, April 17, 2013

TV पत्रकारिता का पहला पाठ




पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद टेलीविजन की चकाचौध भरी दुनिया में प्रवेश करने पर छात्रों को कई नए अनुभव होते हैं। किसी भी संस्थान में ऑन जॉब ट्रेनिंग या इंटर्नशिप करने के दौरान टेलीविजन पत्रकारिता के व्यवहारिक पहलुओं से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है। इसके साथ ही ये भी पता चलता है कि टेलीविजन के आयताकार पर्दे पर जो कुछ दिखता है उसका फलक असलियत में कितना लंबा-चौड़ा और विस्तृत है। कामकाज के सिलसिले की शुरुआत के साथ ही छात्र टीवी पत्रकारिता के अलग-अलग पहलुओं और बारीकियों से परिचित होते हैं जिनका इस्तेमाल करियर में लगातार होता रहता है। पढ़ाई के दौरान सैद्धांतिक तौर पर टीवी पत्रकारिता के जिन पहलुओं के बारे में सिखाया-पढ़ाया जाता है, उनकी तह में जाने का मौका काम शुरु करने पर ही मिलता है- इसके साथ ही सपनों की दुनिया के सत्य से भी साक्षात्कार होता है और मानसिकता धंधे के हिसाब से बनने लगती है। पहले छात्रों में न उतनी जागरुकता थी, ना ही टेलीविजन समाचार कारोबार का उतना विस्तार था, लिहाजा टेलीविजन पत्रकारिता सिर्फ रिपोर्टिंग और एंकरिंग तक सीमित नहीं है, ये बात न्यूज़ चैनल या प्रॉडक्शन हाउस में जाने पर ही पता चलती थी। इसके साथ ही ये तय हो जाता था कि आपको टेलीविजन पत्रकारिता के किसी भी विभाग में काम करना है, तो मूल पहलुओं पर तो सिद्धहस्त होना ही पड़ेगा। वैसे आसमान से टपके देवदूतों की तरह पर्दे पर चमकने वाले चंद गिने-चुने चेहरों के लिए ये जरूरी नहीं था, लेकिन टीवी पत्रकारिता से जुड़नेवाले आम छात्र के लिए हर पहलू पर पकड़ बनाने की चुनौती होती थी, जो आज के दौर में काफी बढ़ गई है। हालांकि समय के साथ पाठ्यक्रमों में बदलाव हुए हैं, पढ़ाई ज्यादा प्रोफेशनल हो गई है और नौकरी दिलानेवाली डिग्री या डिप्लोमा की पढ़ाई करानेवाले ज्यादातर संस्थानों में सैद्धांतिक कोर्स के अलावा उन व्यावहारिक पक्षों पर भी अधिक ध्यान दिया जाने लगा है, जिनसे काम पर जाने पर छात्रों का सीधा मतलब होता है। आजकल स्पेशलाइजेशन का जमाना है, लिहाजा ये भी अमूमन पहले ही तय हो जाता है कि अमुक छात्र रिपोर्टिंग में जाएगा या डेस्क पर काम करेगा या फिर किसी और विभाग के लायक है। ऐसे में एक धारा में आ जाने के बाद विभाग बदल पाना असंभव तो नहीं, लेकिन मुश्किल जरूर है। दूसरी चुनौती ये है कि आपने जिस विभाग को चुना, उसमें आपकी पकड़ बेहद मजबूत हो, जिसकी कोशिश में कई बरस गुजर जाते हैं और अनुभव के साथ पकड़ बनती भी है, लेकिन तब तक दूसरे क्षेत्र में जाने के लिए देर हो चुकी होती है और एक स्तर पर पहुंचने के बाद ज़ीरो से शुरुआत संभव नहीं होती। वैसे कुछ प्रतिभाशाली लोग ऐसे होते हैं, जो अपने मूल काम के साथ-साथ अपनी पसंद के दूसरे विभाग में पहचान बनाने के लिए अतिरिक्त परिश्रम करते हैं और कई बार उसका नतीजा भी बढ़िया होता है। तो टीवी पत्रकारिता का सबसे पहला पाठ तो यही है कि अपना क्षेत्र चुनें और अगर किसी वजह से पसंदीदा क्षेत्र न मिल सके, तो भी उसमें जगह बनाने के लिए प्रयत्न जारी रखें। मसलन अगर कोई छात्र रिपोर्टिंग करना चाहता है, और उसे डेस्क पर तैनात किया गया, तो भी वह अपनी दिलचस्पी के मुताबिक अतिरिक्त कोशिश कर सकता है। ये कोशिश आइडियाज़ पेश करने से लेकर अपने संपर्कों के इस्तेमाल तक पर निर्भर करती है। आप कितने चमकदार हैं इसकी परख जौहरी तभी करेगा, जब उसकी नज़र आप पर पड़ेगी, और जौहरी की नज़रों में आने के लिए आपको अपने ऊपर पड़ी धूल झाड़कर अपनी चमक और निखारनी होगी, तभी आप अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं, ये कर्मवादी मान्यता है। भाग्यवादी भले ही जौहरी की परख में आने के लिए किस्मत पलटने का इंतजार कर सकते हैं। लेकिन जमाना विज्ञान, प्रबंधन का है, तार्किक है, लिहाजा ये मानना बेकार नहीं कि आप अपने कर्मों से अपनी किस्मत बदल सकते हैं। खुद को लाइमलाइट में रखने के लिए आपको मेहनत करनी होगी, आपका नजरिया तीक्ष्ण होना चाहिए, आपके हाव-भाव और बर्ताव में आक्रामकता और तेज़ी होनी चाहिए। आलस्य के लिए टेलीविजन में कोई जगह नहीं। संपादकीय पक्ष में हाथ तंग भी हो तो तकनीकी पक्ष में महारत हासिल करना बेहद जरूरी है और काम किसी भी माध्यम में करना हो, अंग्रेजी पर पकड़ बेहद जरूरी है, क्योंकि आपको अपने काम के कच्चे माल का स्रोत अंग्रेजी के जरिए ही मिलेगा।
बहरहाल, बात टीवी पत्रकारिता के पहले पाठ की हो रही थी, तो आपको बता दें कि टेलीविजन समाचारों और करेंट अफेयर्स प्रोग्राम के प्रॉडक्शन हाउस में बतौर ट्रेनी टीवी पत्रकारिता की शुरुआत करते हुए सबसे पहले जिस शब्द से वास्ता पड़ा वह थी लॉगिंग। टेलीविजन की ग्लैमर भरी दुनिया में जगह बनाने के लिए हसरत भरी निगाहों से न्यूजरूम को निहारते हुए ट्रेनी के लिए लॉगिंग का सबक बेहद ऊबाऊ हो सकता है। ऑडियो-वीडियो टेप के साथ घंटों माथापच्ची और क्लर्क की तरह विजुअल का हिसाब-किताब रखने का काम ऐसा प्रतीत होता है, जैसे किसी टेलीविजन चैनल में नहीं, किसी रूटिन दफ्तर में काम करना हो। ये काम कुछ ऐसा ही है जैसे पढ़ाई शुरु कर रहे बच्चे को तस्वीर बनाने को कहें, तो काफी दिलचस्पी से वो मजे में आड़ी-तिरछी आकृतियां खींचकर आपको दिखा सकता है, लेकिन आप कहें कि वो दो पन्ने लिखना लिखकर दिखाए ताकि हैंडराइटिंग की प्रैक्टिस हो, तो वो भाग जाएगा। सीधे सरल शब्दों में लॉगिंग विजुअल्स के हिसाब-किताब रखने का खेल है। ये काम वैसे तो समाचार चैनलों की लाइब्रेरी से जुड़ा हुआ है, जहां शूट करके लाए गए तमाम वीडियो टेप की फेहरिस्त और पूरी जानकारी रखी जाती है ताकि उन्हें बाद में कभी इस्तेमाल करना हो, तो आसानी से तलाशा जा सके। लेकिन किसी रिपोर्टर या फिर डेस्क पर काम करनेवाले किसी स्क्रिप्ट राइटर या प्रोड्यूसर के लिए भी ये काम काफी महत्वपूर्ण है। इसकी अहमियय इस मामले में है कि जब भी आप किसी स्टोरी की तैयारी करते हैं, तो आपको ये पता होना चाहिए कि उसमें कौन से विजुअल इस्तेमाल होंगे, कौन सी बाइट्स इस्तेमाल होंगी और ये सब कहां मिलेंगे। जाहिर है, यदि किसी रिपोर्टर ने स्टोरी कवर की है, तो उसके शूट टेप में ही ये चीजें होंगी। अब सवाल है कि शूट टेप आधे घंटे से लेकर 3 घंटे तक की रिक़ॉर्डिंग वाले हो सकते हैं और स्टोरी कवरेज के दौरान उनमें शूटिंग भी इतनी या ज्यादा भी यानी कई टेपों में हो सकती है। ऐसे में अगर आपके ऊपर स्टोरी बनाने की जिम्मेदारी है तो आपके लिए सही विजुअल और बाइट तलाशना तब तक काफी मुश्किल और काफी समय खर्च करनेवाला काम होगा, जब तक कि आपके पास आपके इस्तेमाल के लायक जरूरी विजुअल-बाइट की जगह का पता-ठिकाना यानि घंटे, मिनट, सेकेंड और फ्रेम के बारे में जानकारी न मालूम हो। ये काम लॉगिंग के जरिए आसान हो जाता है। वीडियो टेप्स पर रिकॉर्डिंग घंटे, मिनट, सेकेंड और फ्रेम की समयबद्धता में होती है। लॉगिंग वो प्रक्रिया है जिसके तहत टेप पर रिकॉर्डेड वीडियो फुटेज को भली-भांति देखकर उनमें छिपे कंटेंट की जानकारी को टाइमिंग के मुताबिक आगे के इस्तेमाल के लिए कागज पर लिख लिया जाता है। यानी कोई खास विजुअल शॉट्स वो कितने मिनट, कितने सेकेंड और कितने फ्रेम पर है, और कहां से कहां तक कितनी अवधि का है, इसका टाइम कोड कागज पर सारणी बनाकर अंकित करना होगा। स्टोरी की वीडियो एडिटिंग के वक्त ये जानकारी काम आती है और हमें पूरे घंटे या दो घंटे की टेप देखने की जरूरत नहीं होती। साथ ही जितनी जरूरी फुटेज हो, उतनी ही हम अपने काम के लिए अलग कर सकते हैं, उसे टेप से कंप्यूटर में स्टोर कर सकते हैं। ये प्रक्रिया डंपिंग .या इंजेस्टिंग कहलाती है और इसके लिए टेप की लॉगिंग बेहद जरूरी है। लॉगिंग तो कंप्यूटर सिस्टम्स में पड़े वीडियो फुटेज की भी करनी जरूरी होती है, ताकि आप अपनी स्टोरी में उन्हें जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल कर सकें। वीडियो एडिटर को अगर आप ये निर्देश देना चाहते कि कंप्यूटर में पड़े सैकडों-हजारों वीडियो क्लिप्स में से किसी खास शॉट का इस्तेमाल उसे करना है, तो उसे उस क्लिप की आइडेंटिफिकेशन नंबरिंग और शॉट्स के टाइम कोड लॉग करके देने होंगे। यानी क्लोज अप्स, मिड श़ॉट, लांग शॉट, कटवेज़ वगैरा सबकी जानकारी लॉग करके रखी जा सकती है। यही बात बाइट्स के लिए भी लागू होती है कि किसी बाइट का कितना बड़ा हिस्सा कहां से कहां तक इस्तेमाल करने योग्य है, उसके बारे में पता तभी होगा, जब उसका निश्चित टाइम कोड लॉगिंग के जरिए स्टोरी एडिट होने से पहले ही निकाला जाए। अन्यथा काम की एक बाइट निकालने के लिए घंटों लंबा भाषण सुनना पड़ सकता है और इस प्रक्रिया में काफी वक्त बर्बाद हो सकता है। अनुभवी और समझदार रिपोर्टर्स तो कवरेज के दौरान ही इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके काम की बाइट या विजुअल टेप में कितनी देर पर हो सकते हैं। यानी आधे घंटे की रिकॉर्डिंग में अगर ये अंदाजा हो, कि काम की बाइट 15वें मिनट के आसपास शुरु होती है, तो स्टोरी एडिटिंग में बड़ी आसानी होगी। लिहाजा तमाम संस्थानों में एडिटिंग से पहले टेप या विजुअल-बाइट की लॉगिंग की परंपरा चली आ रही है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी का काम नए ट्रेनी रंगरूटों को अक्सर सौंपा जाता है। इसके पीछे ये मानसिकता नहीं होती कि वो और कुछ नहीं कर सकते, बल्कि ये उनके अनुभव के लिए जरूरी है। टेप की लॉगिंग करते हुए तमाम किस्म के विजुअल्स से परिचित होने का मौका मिलता है, तमाम शख्सियतों और जगहों की जानकारी होती है जिन्हें बार-बार देखने पर आप आगे चलकर आप अपनी याद्दाश्त के मुताबिक खुद पहचान सकते हैं। साथ ही लंबे समय तक टेलीविजन में काम करने के लिहाज से ये भी कम अहम नहीं है कि लॉगिंग करते हुए आपके मानस-पटल पर कई विजुअल्स, और यहां तक कि कार्यक्रमों के बारे में भी ये जानकारी अंकित हो जाती है कि वो किस तारीख को कहां से आए हैं और किस टेप में संग्रहित हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि इंसान का दिमाग कंप्यूटर है जिससे सिर्फ टेप देखने भर से सारी जानकारी दिमाग में अंकित रह जाए। इसीलिए लॉगिग की प्रक्रिया में तमाम विजुअल्स, कटवेज़ और बाइट्स के टाइमकोड और टेप नंबर का इंडेक्स बनाने की परंपरा है, ताकि आप कभी भी उस दस्तावेज के जरिए अपनी जरूरत का माल निकाल सकें। जैसा पहले कहा गया, शुरुआत में ये काम बड़ा उबाऊ किस्म का लगता है, लेकिन कामकाज के लिहाज से इसका अनुभव काफी मददगार साबित होता है, जब आप एक संस्थान में लंबी पारी खेलते हैं। अगर संस्थान में टेप संग्रह करके रखने की परंपरा है , तो लॉगिंग के दौरान टेप पर भी नंबरिंग की जाती है और उसमें पाए जानेवाले विजुअल-बाइट की संक्षिप्त जानकारी कागज पर लिखकर चिपका दी जाती है, ताकि बरसों बाद भी उसे तलाशने में दिक्कत न हो।
आमतौर पर लॉगिंग की प्रक्रिया इसलिए बोझिल लगती है क्योंकि इस दौरान वीडियो टेप प्लेयर या रिकॉर्डर पर टेप बार-बार चलाकर और रोक कर देखनी पड़ी है और फिर टाइम कोड संबंधी जानकारियां नोट करनी होती हैं। प्लेयर में Play, Stop, Pause, Fast Forward और Rewind के तमाम बटन होते हैं, जिनका इस्तेमाल इस प्रक्रिया में किया जाता है। shuttle control के जरिए विजुअल्स को देखने में आसानी होती है। वहीं jog control के जरिए विजुअल्स को फ्रेम-दर-फ्रेम देखने की सुविधा होती है। लॉगिंग करते वक्त हेडफोन का इस्तेमाल जरूर होना चाहिए, ताकि टेप में रिकॉर्डेड आवाज से आस-पास के दूसरे लोगों के काम में बाधा न पड़े और आप भी अपना काम सुचारू रूप से कर सकें। लॉगिंग समय लेने और थकानेवाली प्रक्रिया है, लेकिन कई बार इसके जरिए आपको दिलचस्प विजुअल्स और पूरे घटनाक्रम के वीडियो देखने का मौका मिलता है, जो स्टोरी तैयार होने के दौरान काट-छांट दिए जाते हैं। ऐसे में घटनाक्रम की वस्तुस्थिति से अवगत होने और खबर की गहराई में जाने का मौका मिलता है। लॉगिंग के बाद आप ये भी तय कर सकते हैं कि शूटिंग किसी जरूरी या खास हिस्से का किस तरह स्टोरी में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में रिपोर्टर्स के लिए खुद भी अपनी कवरेज के टेप की ल़ॉगिंग करना जरूरी माना जाता है। लेकिन आमतौर पर खबरों की भागमभाग में समय की कमी की वजह से रिपोर्टर हर बिंदु पर नजर रखने के लिए लॉगिंग नहीं कर पाते हैं लिहाजा ये जिम्मेदारी डेस्क के साथियों पर आती है, जो स्टोरी को एडिट करते हैं। तो स्टोरी के साथ न्याय हो और कोई अहम बिंदु छूट न जाए इसके लिए स्टोरी एडिटिंग और स्क्रिप्टिंग से जुड़े लोगों के लिए भी लॉगिंग का उतना ही महत्व है। लॉगिंग टीवी पत्रकारिता का पहला पाठ है और इसकी जरूरत अंत तक पड़ती है यानी खबर या कार्यक्रम प्रसारित होने या उसके बाद उनकी मॉनिटरिंग से जुड़े लोगों के लिए भी इसकी जरूरत होती है। एक खबर से जुड़ी कई खबरें आनेवाले दिनों में आगे तक आ सकती हैं, ऐसे में अगर किसी व्यक्ति ने किसी खबर के रॉ मैटिरियल यानी शूट टेप और रिकॉर्डेड सामग्री की लॉगिंग की है, तो खबर की कड़ियों को जोड़ना उसके लिए आसान हो जाता है। ये सतत प्रक्रिया है जिसे टीवी पत्रकारिता में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और ऐसा अभ्यास है जो आपकी स्मरणशक्ति को भी धारदार बना सकता है। भरोसा न हो तो खुद अनुभव करके देखिए।
अब तो ऐसे ‘Logger’ जैसे स़ॉफ्टवेयर भी आ गए हैं, जिनमें टेलीविजन का हर घंटे के कार्यक्रम खुद रिकॉर्ड होकर सर्वर में संग्रहित होते रहते हैं। जब भी जरूरत हो, तब तारीख और समय के आधार पर ‘Logger’ में रिकॉर्डिंग देखी जा सकती है। लेकिन अगर स्टोरी एडिटिंग के लिए कोई सामग्री इस्तेमाल करनी है, तो शूट टेप या लाइब्रेरी टेप की लॉगिंग से ही काम आसान होगा। आजकल टेप पर रिकॉर्डिंग का रिवाज खत्म होता जा रहा है, और कैमरों में कंप्यूटर आधारित रिकॉर्डिंग डिस्क, चिप और माइक्रो SD कार्ड्स का इस्तेमाल होने लगा है, लेकिन 10 -15 साल पहले से बीटा, DG बीटा, हाई-8, से लेकर अब तक DV और मिनी DV टेप्स पर शूटिंग और रिकॉर्डिंग की परंपरा रही है। कई टेलीविजन चैनलों की लायब्रेरीज़ में पड़े ऐसे हजारों टेप्स में देश के तमाम घटनाक्रमों के दस्तावेजी सबूत भरे पड़े हैं, जो जरूरत पड़ने पर तलाशे जाते हैं और इस्तेमाल किए जाते हैं।  
-          कुमार कौस्तुभ
17.04.2013, 5.12 PM