Sunday, January 12, 2014

TV प्रोग्राम, परिकल्पना, शोध और कुछ जरूरी मुद्दे



साल 2013 में भारत के हिंदी न्यूज़ चैनल एबीपी न्य़ूज़ पर प्रसारित कार्यक्रम प्रधानमंत्री की बेहद तारीफ हुई। भारत की स्वाधीनता के बाद के राजनीतिक-एतिहासिक परिदृश्य पर बनाया गया ये कार्यक्रम कई वजहों से काबिले-तारीफ भी रहा और काबिले-गौर भी। मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर की एंकरिंग ने देश के राजनीतिक-एतिहासिक घटनाक्रम को बड़े सलीके से बांधा। वहीं, कार्यक्रम की सधी हुई स्क्रिप्टिंग ने घटनाक्रम के प्रमुख बिंदुओं को बड़े ही सुंदर तरीके से उभारने की कोशिश की। इसी दौर में आजतक चैनल की ओर से कबीर बेदी ने वंदे मातरम नाम का कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसकी उतनी तारीफ तो नहीं हुई, भले ही रेटिंग्स में दोनों कार्यक्रम एक-दूसरे से कड़ी टक्कर लेते रहे हों। जाहिर है, ऐसे कार्यक्रमों की रीढ़ सिर्फ स्क्रिप्टिंग ही नहीं, उनकी शानदार एडिटिंग और सबसे बढ़कर उनके पीछे छुपा हुआ शोध होता है। शोध की जरूरत कार्यक्रम की परिकल्पना से बनती है और साथ में ये भी तय करना होता है कि कार्यक्रम का क्या लक्ष्य है और उसके लिए कितनी मेहनत की जानी है। ये पूरी प्रक्रिया कई तरह के सवाल खड़े करती है, जो प्रधानमंत्री और वंदे मातरम जैसे कार्यक्रमों के अलावा तकरीबन हर ऐसे करंट अफेयर्स कार्यक्रम के पीछे रहते हैं, जो कई कड़ियों में पेश किए जानेवाले हों।
टीवी के समाचार चैनलों पर प्रधानमंत्री या वंदे मातरम या फिर कुछ अरसा पहले प्रसारित परमवीर चक्र जैसे कार्यक्रमों की परिकल्पना ही अपने-आप में एक अहम मुद्दा है। आखिर, रोज घट रही घटनाओं को समाचार के रूप में दिखानेवाले चैनलों को भला एतिहासिक घटनाक्रम को रिविजिट करने, उसके पुनर्पाठ, उसके नाट्यांतर की जरूरत क्यों पड़ती है? इसका कोई संदर्भ होना चाहिए। अमूमन संदर्भ तो तलाश लिए जाते हैं। आम चुनावी साल से पहले देश में बदलते राजनीतिक दौर, नेतृत्व के सवाल, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम जैसी कई चीजें इससे जुड़ी हो सकती हैं। कुछ नहीं तो, आम दर्शकों को राजनीतिक बदलावों के इतिहास से परिचित कराना भी एक मकसद हो सकता है, जो शायद एंटरटेनमेंट चैनलों में उतनी गंभीरता से संभव नहीं, जितनी गहराई और संजीदगी से समाचार और करंट अफेयर्स चैनलों में संभव है। तीसरा एक संदर्भ टीवी चैनलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ का भी है।
भारत में टीवी के समाचार चैनलों की भीड़ में एक-दूसरे या सबसे अच्छे या फिर प्रतिद्वंद्वी चैनल की नकल की प्रवृति आमतौर पर देखी जाती है। मकसद ये होता है कि एक चैनल अपनी पेशकश के जरिए दूसरे को रेटिंग्स में पछाड़ दे। इसके लिए एक ही या मिलते-जुलते टाइम स्लॉट्स में मिलते-जुलते थीम के कार्यक्रम पेश करने की कोशिश देखी जाती है। प्रतियोगिता के दौर में आगे बढ़ने का ये फंडा मुकम्मल है और टीवी के गंभीर दर्शकों को भी इसके जरिए तरह-तरह की मानसिक खुराक मिलती है, तो नए दौर के, युवा और किशोर दर्शकों को उन घटनाक्रम से परिचित होने और अपना सामान्य ज्ञान मजबूत करने का मौका मिलता है, जो इतिहास के पन्नों में और मोटी-मोटी किताबों या नेशनल आर्काइव्स के दस्तावेजों में मौजूद हों। आमतौर पर ऐसी चीजों की खोज वही करते हैं, जिन्हें उनके बारे में कोई खास जरूरत हो, मसलन, इतिहास के छात्र, अध्येता, या कोई और। लेकिन टीवी पर ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण से आम दर्शकों को, खासकर युवा और किशोर दर्शकों को भी उन जानकारियों से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है, जो देश की रचना, इसके विकास की प्रक्रिया में शामिल हैं। हर देश के प्रबुद्ध नागरिक के लिए मोटे तौर पर देश के इतिहास और राजनीति का ज्ञान होना जरूरी माना जाता है, वैसे, ना भी जानें तो कोई बात नहीं। लेकिन अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, संस्कारों और परंपराओं को जानने के लिए एतिहासिक घटनाक्रम से कुछ हद तक परिचित होना ही चाहिए। बहरहाल, ये मुद्दा अलग है। पर टेलीविजन के समाचार चैनलों में एतिहासिक-राजनीतिक घटनाक्रम को विश्लेषण के जरिए दिखाने का जो चलन दिखा है, वो काफी हद तक बुरा नहीं है। दिक्कत तब आती है, जब उन घटनाक्रम के टीवीकरणमें कहीं कोई तथ्यात्मक या कोई और ऐसी भूल हो जाए, जिससे बेवजह गलतफहमियां पैदा हों। यही वो पक्ष है, जहां, कड़ियों में प्रसारित होनेवाले करंट अफेयर्स कार्यक्रमों के लिए कसे हुए शोध की जरूरत महसूस होती है।
आमतौर पर टीवी के समाचार चैनलों में शोध यानी रिसर्च का सेक्शन हुआ करता है, जिससे जुड़े लोगों का काम जरूरी मुद्दों, घटनाओं पर बैकग्राउंडर मुहैया कराना होता है। यही लोग आम तौर पर चैनलों की मॉनिटरिंग भी करते हैं और साथ ही साथ अखबारों, वेबसाइट्स और अन्य स्रोतों से खबरिया महत्व की चीजें टीवी चैनल के इनपुट और आउटपुट डेस्क को मुहैया कराते हैं। दसेक साल पहले तक रिचर्स से जुडे लोगों का काम अखबारों की क्लिपिंग्स सहेजकर रखना होता था, लेकिन अब तमाम अखबार इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, इसलिए इस काम का तरीका कुछ बदल गया है। आमतौर पर रिसर्च के लोगों से खबरों के बैकग्राउंडर मांगे जाते हैं और बड़े स्तर पर करंट अफेयर्स कार्यक्रमों की परिकल्पना सामने आने पर उनके बारे में भी जानकारी मुहैया कराने को कहा जाता है। जो जानकारियां वो तमाम स्रोतों, वेबसाइट्स, किताबों से खंगालते हैं, वो प्रोग्राम के प्रोड्यूसर, स्क्रिप्ट राइटर और अन्य लोगों को दी जाती है, ताकि उसके आधार पर वो कहानी की कड़ियां, या यूं कहें कि प्रोग्राम को शक्ल देने के लिए परिकल्पना के मुताबिक, घटनाक्रम का तानाबना बूनकर स्क्रिप्ट या लिखित रूप में ढांचा तैयार करें और फिर उसे आगे बढ़ाया जा सके। इस प्रक्रिया में बहुत से ऐसे लोगों से बातचीत की जरूरत पड़ती है, जो मुद्दे को समझते हों, उसके बारे में गहराई से जानकारी रखते हों। ऐसे लोगों से बातचीत करने, उनका इंटरव्यू करने या उनकी साउंड बाइट्स लेने का काम आमतौर पर रिपोर्टिंग के लोगों को सौंपा जाता है। यानी सरल तरीके से देखें तो कार्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया की रूपरेखा कुछ इस तरह बनती है-

परिकल्पना (प्रोड्यूसर/एग्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर)->
रिसर्च ( जानकारी) ->
।---------------------------------àरिपोर्टर्स ( इंटरव्यू-बातचीत-साउंड बाइट्स)
->स्क्रिप्ट राइटर ( स्क्रिप्ट)
-> एडिटिंग ( वीडियो एडिटर )
                                                                                                             

यानि, रिसर्च से मिली जानकारी और स्क्रिप्ट तैयार करने के बीच रिपोर्ट्स की भूमिका उन जानकारों से बाइट्स लाने की होती है, जो मुद्दे पर अहम जानकारियां दे सकें और कार्यक्रम को अपनी मौजूदगी से समृद्ध भी कर सके। साथ ही, रिपोर्टर्स से आवश्यकतानुसार जरूरी लोकेशन से पीस-2-कैमरा देने को भी कहा जा सके, जिसकी जरूरत कार्यक्रम को जीवंत बनाने और उसे समृद्ध करने के लिए होती है। लेकिन असल में दिक्कत तब पेश आती है, जब स्क्रिप्ट राइटर और रिपोर्टर में तालमेल न हो यानि ऐसी स्थिति जब प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर रिपोर्टर को ये न समझा सकें कि उन्हे रिपोर्टर से क्या चाहिए या फिर रिपोर्टर ये न समझ सकें कि उन्हें क्या करना है, अमुक आदमी से किस तरह के सवाल पूछने हैं, क्या उत्तर लेना है, जो प्रोग्राम के हिसाब से मुकम्मल हो। जब प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर खुद ही संबंधित लोगों से इंटरव्यू करने जाएं तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। बल्कि, यही आदर्श स्थिति है कि प्रोड्यूसर और/ या स्क्रिप्ट राइटर ही प्रोग्राम के लिए जरूरी जानकार लोगों, विशेषज्ञों के चयन करें और उनसे बातचीत करने जाएं। ये आदर्श स्थिति एंटरटेनमेंट चैनलों या नॉन-फिक्शन, करंट अफेयर्स प्रोग्राम दिखानेवाले चैनलों में हो सकती है, जहां प्रोग्रामिंग टीम का स्वरूप भिन्न होता है। लेकिन टेलीविजन के समाचार चैनलों में आमतौर पर स्थिति अलग दिखती है, चुनिंदा जगहों को छोड़कर, जहां कार्यक्रमों के लिए तय टीमों के लोगों पर ही अपनी जरूरत के मुताबिक विशेषज्ञों को लाइन अप करने और उनसे बात करने का जिम्मा होता है। अमूमन टीवी के समाचार चैनलों में विशेषज्ञों से बातचीत या इंटरव्यू करना और साउंड बाइट हासिल करना रिपोर्टर्स का ही काम होता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि रिपोर्टर्स के संपर्क तगड़े होते हैं और जानकारों, विशेषज्ञों और ऐसी शख्सियतों से उनका मिलना-जुलना भी होता है, जिनकी बाइट्स प्रोग्राम में जान डाल सकती हैं। तो एक तरीके से बाइट लाना उनकी जिम्मेदारी भी बन जाती है और दूसरे रूप में देखें, तो टीम वर्क होने और मैनपॉवर का सदुपयोग करने की मानसिकता की वजह से ये काम उन्हीं को सौंप भी दिया जाता है।
लेकिन उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं के जरिए जो कमी सामने आती है, वो ये कि कई बार रिपोर्टर प्रोग्राम की जरूरत के मुताबिक माल ( बाइट, इंटरव्यू ) लाने में असफल रहते हैं। इसकी एक वजह तो ये है कि प्रोग्राम से उनका सीधा नाता नहीं होता, अक्सर मुद्दे की समझदारी भी नहीं होती, ना ही जिस व्यक्ति से वो बात करने जा रहे हैं, उससे बातचीत के लिए जरूरी तैयारी होती है। ऐसे में वो दिए गए थीम पर चंद सवाल पूछकर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेते हैं। ऐसा भी कई बार देखा गया है कि प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर की ओर से चंद सवाल तैयार करके दे दिए जाते हैं और रिपोर्टर उन्हीं सवालों के जवाब लेकर आ जाते हैं। इस तरीके से अगर बातचीत में किसी हद तक और विशेष या दिलचस्प जानकारियां उगलवाने की संभावना भी नगण्य हो जाती है। कई बार मजबूरी में, चुंकि मुद्दे का जानकार, विशेषज्ञ दूसरे शहर में या दूसरे देश में हो, तो बाइट और इंटरव्यू के लिए रिपोर्टर्स पर निर्भर रहना लाजिमी है। ऐसी स्थितियों में भी अगर प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर और रिपोर्टर्स के बीच मुद्दे पर चर्चा न हो तो काम की चीज मिलेगी या नहीं, इस पर संशय बरकरार रहता है। मुद्दे के जानकारों और विशेषज्ञों से प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर की सीधी बात इसलिए भी जरूरी है कि अनौपचारिक बातचीत के दौरान भी मुद्दे पर कई अहम जानकारियां और एंगल मिल सकते हैं जिनके आधार पर प्रोग्राम समृद्ध और सुंदर बन सकता है। लेकिन ऐसा कम ही देखा जाता है क्योंकि समाचार चैनलों में इस तरह की प्रक्रिया की परिपाटी नहीं के बराबर है।
एक और अहम मुद्दा प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर के रिसर्च सेक्शन से संबंध का है। आमतौर पर टेलीविजन के समाचार चैनलों में किसी भी मुद्दे पर प्रोग्राम जल्दबाजी में झटपट तरीके से बनते हैं। ऐसे में टीम वर्क के तहत रिसर्च सेक्शन से मुद्दे पर जानकारियां मांगी जाती हैं और उन्हें ऐसे प्रोड्यूसर्स और स्क्रिप्ट राइटर्स को सौंप दिया जाता है, जिनका मुद्दे से बहुत लेना-देना न हो। ऐसे में मिली हुई जानकारी और अधकचरी समझ का सहारा लेकर प्रोड्यूसर्स प्रोग्राम की दिशा तय करते हैं और स्क्रिप्ट राइटर्स डेडलाइन के अंदर तय रूपरेखा और ढांचे के तहत स्क्रिप्ट छाप (!) कर रख देते हैं। ये पूरी तरह मशीनी प्रक्रिया है, जिसके तहत किसी भी प्रोग्राम का बेड़ा गर्क होना कोई बड़ी बात नहीं। किसी जटिल मुद्दे की सही समझ न होने पर प्रोग्राम की दिशा गड़बड़ा सकती है। गहराई से जानकारी न होने पर तथ्यात्मक भूलें भी हो सकती हैं। हालांकि ऐसा न हो, इसके लिए कड़ी मेहनत की जाती है और काफी ख्याल रखा जाता है। कुछेक गंभीर प्रोग्राम ही ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें तमाम भूलों से बचकर तैयार किया गया हो और इसके लिए जाहिर है, चैनल की प्रोग्रामिंग टीम को किसी भी स्तर पर कोई समझौता नहीं करना पड़ा होगा। परंतु, आमतौर पर टीवी चैनलों की फैक्ट्रियों में बननेवाले प्रोग्राम में ब्लंडर की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। शुक्रिया, उन करोड़ों दर्शकों का, जो खुद भी मुद्दे से बहुत परिचित नहीं होते और किसी भी प्रोग्राम की ग्राफिक्स, एनिमेशन से सजावट और बाहरी मुलम्मे के साथ-साथ विशेषज्ञों की सार्थक बाइट्स के मायालोक में फंसकर उसकी तारीफ करने से नहीं चूकते, जो रेटिंग्स में बदलकर चैनल की लोकप्रियता को दर्शाती है।
जाहिर है, किसी भी मुद्दे पर छोटा या कई कड़ियों का मुकम्मल टीवी प्रोग्राम  तैयार करने के लिए गहन रिसर्च की जरूरत है ताकि उसके बारे में सही समझदारी बन सके। इसके लिए, यदि प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर खुद रिसर्च में जुटें तो बात आसानी से बन सकती है। साथ ही, अगर जानकारों और विशेषज्ञों से बातचीत भी प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर खुद करें तो स्थिति और बेहतर हो सकती है। लेकिन, टेलीविजन के समाचार चैनलों की प्रोग्रामिंग टीमों पर पहले ही इतना भार रहता है कि वो कहां इतना समय किसी एक प्रोग्राम को दे सकते हैं। समाचार चैनलों पर भारत-एक खोजया इस तरह के चुनिंदा कार्यक्रमों की उम्मीद करना यूं तो बेमानी है, लेकिन प्रक्रिया में सुधार की गुंजाइश हमेशा है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
एक बड़ी कमी जो टीवी के समाचार चैनलों में खलती है, वो ये कि विषय विशेष पर विशेषज्ञ या जानकार प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर अक्सर नहीं होते। प्रोड्यूसर्स तकनीकी तौर पर माहिर हो सकते हैं, स्क्रिप्ट राइटर्स भाषा और स्क्रिप्ट की दिशा तय करने में पारंगत हो सकते हैं, लेकिन विषय विशेष की विशेषज्ञता की कमी उन्हें अक्सर Jack of All Trades, Master of Noneही बना डालती है। ऐसे में किसी विशेष मुद्दे के लिए प्रोड्यूसर्स और स्क्रिप्ट राइटर्स की कमी उन रिपोर्टर्स के जरिए पूरी की जाती है, जो खास बीट देखते हों। मसलन, ऐसा माना जा सकता है कि राजनीतिक मामलों के रिपोर्टर राजनीति से जुड़े मुद्दों की समझ रखते हैं, मेट्रो के रिपोर्टर दिल्ली-मुंबई से जुड़े मामले समझते हैं, उनकी जानकारी रखते हैं। खेल, एंटरटेनमेंट, सिनेमा, बिज़नेस के मामलों में ऐसा होता भी है। लेकिन, इतिहास, राजनीति, विज्ञान, भूगोल जैसे मामलों में काम कॉमन प्रोड्यूसर्स और स्क्रिप्ट राइटर्स से ही चलाना पड़ता है। वजह ये है कि चैनलों में विषय-विशेष की समझदारी रखनेवालों को प्रोड्यूसर-स्क्रिप्ट राइटर रखने का चलन ही नहीं है, क्योंकि रोजाना ऐसी जरूरत पड़ती नहीं। यहां तो ऐसे ही लोग चलते हैं, जो हरफनमौला हों- हर विषय पर पकड़ रखने के दावे करते हों। ऐसे में नुकसान टीवी के समाचार चैनल देखनेवाले दर्शकों का हो रहा है, जिनकी चिंता शायद किसी भी चैनल को नहीं है।
-          कुमार कौस्तुभ

Tuesday, January 7, 2014

सोशल मीडिया और समय की कीमत



फेसबुक..ट्वीटर..व्हाट्सएप..ऑरकुट..गूगल+ ..इंस्टाग्राम..पिनइंटेरेस्ट..ब्लॉग..- सोशल मीडिया के और न जाने कितने ही रूप इन दिनों इंटरनेट की मायावी दुनिया में शुमार हो चुके हैं और इनके इस्तेमालकर्ताओं की तादाद दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आज के इंटरनेट आधारित समय में हम वर्चुअल वर्ल्ड में जीते हैं, जिसका कोई ठोस अस्तित्व नहीं होता, जिसमें दिन या रात का कांसेप्ट नहीं होता, जिसमें कभी भी छुट्टी नहीं होती, ना ही कभी तालाबंदी होती है (बशर्ते, सर्विस प्रोवाइडर की ओर से कोई दिक्कत न हो)..यानी ये 24 घंटे, 365 दिन दुनिया के हर कोने के लोगों को हर पल आपस में जोड़े रखने में सक्षम है, सार्वदेशिक और सार्वकालिक है...सीमाओं से परे है। इनके जरिए कहीं भी चार लोग उठते-बैठते नहीं देखे जा सकते। लेकिन सोशल मीडिया के जरिए इस प्रक्रिया को महसूस किया जा सकता है क्योंकि ये दुनिया सदैव जीवंत है। हर पल इसके जरिए हम किसी से भी जुड़ सकते हैं, बातें कह सकते हैं, अपनी सुना सकते हैं, उसकी सुन सकते हैं (शर्त है, अगर वो ऐसा चाहे तो)। फर्क सिर्फ इतना है कि ठोस रूप में आमने सामने न होने की वजह से आपस में कोई असहज स्थिति नहीं आ सकती, एक-दूसरे में हाथापाई या सिर-फुटव्वल नहीं हो सकती, लेकिन बेलगाम तरीके से एक-दूसरे को कुछ भी कहने, गाली-गलौच तक की सुविधा आसान है। हां, ये भी सुविधा है कि ऐसी स्थिति में जिससे बात करना या जिसकी बात सुनना न चाहें, उसे अनफ्रेंड कर दें, या ब्लॉक कर दें। लेकिन सोशल मीडिया की सुविधाएं और असुविधाएं दोनों ही विचारणीय हैं।
जिस तरीके से इंटरनेट पर मेल यानी खतोकिताबत और चैटिंग यानी बातचीत की सुविधा ने पारंपरिक डाक व्यवस्था और टेलीफोन को किनारे कर दिया है, उसी तरीके से अब इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया भी पारंपरिक सामाजिक व्यवहार में कई तरह के बदलाव लाता दिख रहा है। इस सिलसिले में सबसे बड़ा मुद्दा है समय का। काफी लोगों की शिकायत रहती है कि सोशल मीडिया उनका समय बर्बाद करता है। आलसी बना देता है। परोक्ष रूप से आपकी जेब भी काट लेता है क्योंकि आज सोशल मीडिया पर जब सक्रिय रहते हैं तो इसका हिसाब रख पाना बेहद कठिन होता है कि असल में इंटरनेट का कितना चार्ज सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां वसूल रही हैं और कई बार जब महीने का बिल आपके हाथ में आता है, तो आप हिसाब जोड़ते फिरते हैं कि आखिर कैसे बिल इतना बढ़ गया। गूगल सर्च से मिली जानकारी के मुताबिक,
“Of the total time spent consuming (or producing) information on the internet around the world, 15.8% is spent on Facebook. Research shows that each Facebook user, on average, spends more than eight hours a month on the social media site, and every day a total of 20 billion minutes are spent on Facebook.”[1]

साफ है कि सोशल मीडिया पर जो समय हम और आप खर्च कर रहे हैं, उसकी सही कीमत शायद हमें नहीं मालूम, ना ही हम उसका कोई अंदाजा लगा पाते हैं। वजह ये है कि हमें खुद अपने समय की कीमत नहीं मालूम। आज की व्यस्त और भागदौड़ भरी दुनिया में हम अपने समय को मैनेज नहीं कर पाते, हम ये तय नहीं कर पाते कि जो समय हमारे पास है, उसका किस तरीके से सार्थक उपयोग हम कर सकते हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर निरर्थक बहसबाजी और गप्पबाजी में हमारा कितना समय जाया हो जाता है, इसका हिसाब हम नहीं रख पाते। शायद हम हिंदुस्तानियों के पास धन-दौलत की कमी भले हो, लेकिन समय़ इफरात में है, जिसका हम भरपूर इस्तेमाल ऐसे निरर्थक कामों में करते हैं, जैसे सोशल मीडिया पर फिजूल की चैटिंग में। अक्सर किशोरों और युवावर्ग में ऐसा देखा जाता है कि वो सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा मशगूल रहते हैं- दोस्तों से गप्पें लड़ाने में, लड़कियों को पटाने की कोशिश में, या फिर गेमिंग और ऐसी हरकतों में जिनसे उनके करियर या जिंदगी में कोई फायदा तो नहीं ही हो सकता। ऐसे चंद, बिरले ही युवा हैं, जिनकी सोशल मीडिया पर सक्रियता उनके लिए किसी तरह से लाभकारी साबित हुई हो, चाहे काम-काज या नौकरी के सिलसिले में या फिर निजी जीवन के किसी पहलू में। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जिनमें सोशल मीडिया के अधिकाधिक इस्तेमाल से किसी व्यक्ति का भला हुआ हो। सोशल मीडिया पर दोस्ती बढ़ाकर लड़कियों को ठगे जाने के मामले रोज ही सामने आते हैं। दो-चार दिल सोशल मीडिया के जरिए भले ही आपस में जुड़ गए हों, लेकिन न जाने कितने ही दिल टूटने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।
सोशल मीडिया से हो रहे नुकसानों का कारण आखिर क्या है? क्या सोशल मीडिया गैरजरूरी है? क्या ये समाज के लिए, लोगों के लिए ज़हर है, विनाश का हथियार बन गया है? सोशल मीडिया को लेकर तमाम नकारात्मक सोच उभर सकती हैं। लेकिन जैसा कि हर मामले में होता है, हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष होते हैं। मेरी राय में सोशल मीडिया से होनेवाले नुकसानों का तो कारण यही है कि इसका सार्थक इस्तेमाल नहीं हो रहा, ना ही इसको लेकर समय की कीमत समझी जा रही है। गूगल सर्च के जरिए हासिल जानकारी के मुताबिक, युवा वर्ग सोशल साइट्स पर अपना काफी वक्त गुजारता है और काफी हद तक युवा इससे इंकार भी नहीं करते-
“According to at least one study, more than 80% of Generation Y internet users have at least 1 social network (66% use Facebook). Of those users, 80% log on daily. When asked why they use social media, 54% of Generation Y users said it was for “killing time.” In fact, the most popular time for logging onto social media sites is during leisure time (73% of Generation Y users agreed with this).”[2]

जिस समय में हम जी रहे हैं, वो बड़ा ही मूल्य़वान है। मिनट, घंटे, दिन, महीने, साल – गुजरते जाते हैं, हमें पता नहीं चलता। वैसे ही सोशल मीडिया पर , फेसबुक पर और ट्विटर पर स्टेटस देखने में ही इतना वक्त गुजर जाता है कि उसका पता नहीं चलता और अगर कमेंट देने लगें, तो और भी ज्यादा समय निकल जाता है। ये सही है कि फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स आजकर खबरों का भी बड़ा जरिया बन गई हैं , साथ ही सूचना और मनोरंजन का भी से बड़ा साधन हैं। एक तरीके से देखा जाए, तो इन्होंने टेलीविजन और रेडियो के
ऑडिएंश में सेंध लगा दी है क्योंकि सामाजिक माध्यम होते हुए भी इनके बेहद व्यक्तिगत और निजी इस्तेमाल की सुविधा उपलब्ध है- चाहे वो स्मार्टफोन पर हो, या टैबलेट, लैपटॉप और डेस्कटॉप कंप्यूटरों पर । एक ही वक्त में अलग-अलग लोग अपने-अपने तरीके से, अपनी-अपनी पसंद से सोशल साइट्स, सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर सकते हैं और इनका मज़ा ले सकते हैं। लेकिन जैसे
इडियट बॉक्स की संज्ञा हासिल कर चुका टेलीविजन लोगों का समय जाया करने में माहिर है, उससे कई गुना ज्यादा नुकसान तो सोशल मीडिया कर रहा है। कहा जाता है कि अति सर्वत्र वर्जयेत यानी अति किसी भी चीज की बुरी होती है। तो यही बात पहले टेलीविजन से चिपके रहने को लेकर और अब सोशल मीडिया पर आंखें गड़ाए रहने को लेकर देखी जा रही है। गूगल पर पढ़ते हुए एक ब्लॉगर ब्रियान गार्डनर की टिप्पणी इस मामले में काबिले गौर लगी-
It’s counterintuitive to think that something so necessary can actually be harmful. While social media isn’t as crucial for our existence, the reality is too much of a good thing can prove to be destructive.
I’m the first to admit that I spend a lot of time on Facebook, Google+, Instagram and Twitter. In fact, these are the four basic social media food groups for me.
But when we overindulge and social media begins to run our lives, something needs to change. When it takes time away from family, or causes resentment when you’re away from the computer or mobile devices, there’s a problem.
And some very smart people might even consider it an addiction.”[3]
गार्डनर ने इस मामले में अपने ब्लॉग पर लोगों से टिप्पणियां आमंत्रित की थीं। कई लोगों ने माना कि सोशल मीडिया, और खासकर स्मार्टफोन पर उसका इस्तेमाल उनकी जिंदगी में बेतरह घर कर चुका है-
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  1. Eric Highland says
Brian, I’ve been thinking about this a lot lately. Like you, I spend countless hours of each day online. My poison is FB, Twitter, Google Analytics, My Blog, and Hootsuite (in that order).
Recently my wife and I went to Toronto for 2 weeks to visit her grandfather. The rates for our iPhone usage there was so high we decided not to use them and to only connect to the Internet via free wifi at Starbucks or a place they have there called Tim Horton’s.
For the first few days it was incredibly difficult to be without my phone or constant wifi. I even found myself pulling it out of my pocket and then realizing all that I could really do was check the date and time. Eventually the phone stayed in my pocket.
The journey went from difficulty to annoyance to acceptance to liberation. It was so nice by the end of our trip that I made a decision to pretend I was in Canada when I got back home.
2 Katie says
I agree with you Brian. Too much social media makes me feel scattered and distracted. It seems to encourage shallow relationships too.
3 Ty says
I have a daily routine that I think I need to change and that is I grab my phone first thing. I go through all 4 of the same food groups. I was just thinking this morning that.. That is a crazy way to wake up.
If you think about it there is a lot of negative and issues of others that you absorb. Probably not a good thing for the soul first thing.
There is a lot to learn in Social in my case I need to learn to check things later in the day..
4 komiska says
I believe a lot of us live in denial – like the smokers saying: “I can stop whenever I want” … Yeah, sure!
Well, it is easier than stopping smoking.
Just turn OFF the social media sites. Yeah, right!
I’d love to know how all the famed web developers and web designers deal with the social media rabbit hole, as I do see them tweeting a lot
I admit to trying all the possible “Off-time” apps, that block the sites while working. Alos very helpful: worming on iMac, and having internet and e-mail opened on MBP .
It really helps separating the tasks also in the head.
But still, the temptation is always there.
We are just loving the conversation , right? The ever new stuff we might miss, oh gawd !!! All those happy endorphins shooting up when there’s a new tweet or Facebook post about some WordPress trick , jQuery new hover effect… Like a gold-rush!
5 Sammy says
Guilty as charged. It is killing not just my soul but killing me in terms of productivity, and even my social life. I sometimes don’t bother showing up for meet-ups or coffee with friends because I can just go online and chat with them anyway. How’s that for friendship.
I don’t think I need to expound further when it comes to productivity cos I know this is quite common. But emotions wise/soul-wise, it is definitely a big burden for me. I would check pages or profiles see people talking about issues which sometimes I’m very passionate and sensitive about..and end up being angry or sad or miserable because of the comments I read and I can’t help but dwell on them! I’ve told a few friends about this, I wish I would learn how to disconnect, not just literally, but to stop feeling so attached and affected all the time.

जाहिर है, सोशल मीडिया से आदमी के कामकाज पर तो असर पड़ ही रहा है, लोगों के सामाजिक मेल जोल की परंपरा भी खत्म हो रही है। लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि व्यस्तता और भागदौड़ भरी जिंदगी में सोशल मीडिया पर संपर्कों को जिंदा रखना बड़ा आसान है। जिंदगी के किसी भी पल में मिले किसी शख्स को बरसों बाद भी सोशल मीडिया पर पाया जा सकता है, उससे संपर्क स्थापित किय़ा जा सकता है। दोस्त भी मिल सकते हैं और दुश्मन भी। मैसेजिंग और चैटिंग की व्यवस्था हमें उनसे किसी भी क्षण संपर्क जोड़ने की सुविधा देती है। लेकिन, इस प्रक्रिया में ये तो मालूम नहीं होता कि अमुक व्यक्ति किस स्थिति और परिस्थिति में है और क्या आपकी बात को ग्रहण करने की हालत में है? क्योंकि वो सामने नहीं होता, उसके भाव, उसकी मुद्रा से उसके मन को आप पढ़ नहीं सकते। ऐसे में यदि जवाब नहीं मिलता है या फिर नकारात्मक जवाब मिलता है, तो बेवजह गलतफहमियां पैदा होती हैं। तो ये बड़ा सवाल है कि आखिर सोशल मीडिया पर ये कैसे पता लगाया जाए कि अमुक व्यक्ति आपसे बात करने का इच्छुक है या नहीं या फिर वो कितना व्यस्त है, कहीं आप उसके काम में खलल तो नहीं डाल रहे? क्योंकि जब तक सामने वाला खुद नहीं बताए तब तक उसकी स्थिति के बारे में आप नहीं जा सकते। हालांकि इसके लिए भी सोशल मीडिया में व्यवस्थाएं हैं और ऐसे बटन, ऐसी पोजिशनिंग सेट करने के इंतजाम मिलते हैं जिससे ये पता चले कि आप किसी से बात करने के लिए उपलब्ध हैं या नहीं। हमारे तमाम मित्र सोशल मीडिया पर दूसरे मित्रों की स्थितियां देखते रहते हैं, लेकिन कई बार वो अपनी स्थिति बताने में असमर्थ रहते हैं या व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उनसे बात करने का सही समय क्या हो, ये पता लगाना उलझनभरा और मुश्किल काम है।
हो सकता है आप जिस वक्त सोशल मीडिय़ा के इस्तेमाल के लिए खाली समय निकाल रहे हों, उस वक्त आपका कोई मित्र व्यस्त हो। या फिर आपकी व्यस्तता के चलते आपसे बात करने की कोशिश किसी के लिए कामयाब न होती हो। जिस तरह से भारत और अमेरिका और ब्रिटेन या और कई देशों के टाइम ज़ोन अलग हैं, ऐसे में सोशल मीडिया पर तमाम देशों में रहनेवालों से संपर्क करना भी तब तक सहज नहीं, जब तक कि आप उनकी जीवनचर्या, रहन-सहन और रूटिन के बारे में नहीं जानते हों। हालांकि विदेशों में रहनेवाले भारतीय़ों से भारत के उनके रिश्तेदारों और परिचितों का संपर्क सोशल मीडिया ने जरूर आसान बना दिया है क्योंकि इनके जरिए एक दूसरे का हाल जानना बड़ा आसान और सस्ता भी है।
सोशल मीडिया के इस्तेमाल के कई आयाम हैं। कई लोग ये भी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया उनके लिए काफी लाभकारी है। निस्संदेह, यदि किसी को अपनी बात रखनी है, तो उसके लिए ये एक बढ़िया मंच है, जिस पर आपके कथित दोस्त और दुश्मन भी आपकी राय जान सकते हैं, आपके विचारों से परिचित हो सकते हैं और उस पर अपना नजरिया पेश कर सकते हैं। कारोबारियों के लिए सोशल मीडिया अपने ब्रांड प्रमोशन का जरिया बन गय़ा है। पेज बनाकर उसे लाइक करने और करवाने की कोशिशें प्रमोशन के फंडे में शामिल हो गई हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी सोशल मीडिया अपनी बात लोगों के सामने लाने का एक सशक्त औजार बन गय़ा है और सिर्फ अपनी बात सामने रखने का ही नहीं, उस पर फीडबैक हासिल करने का भी ये एक बड़ा जरिया है, क्योंकि किसी पक्ष की ओर से कोई बात फेसबुक या ट्विटर पर कही जाती है तो जल्द से जल्द उस पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरु हो जाती हैं। ये बात दीगर है कि फीडबैक पर कितना ध्यान दिय़ा जाता है। हो सकता है फीडबैक को निगेटिव कैंपेन भी माना जाता हो। परंतु ऐसा माने जाने का सबसे बड़ा खतरा ये है कि इस तरीके से तटस्थ या निस्वार्थ प्रतिक्रियाओं पर भी ध्यान नहीं दिया जाता और उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। इसके चलते सोशल मीडिया का इस्तेमाल एकतरफा ही दिखता है, ये प्रमोशन का ही हथियार बनकर रह जाता है।
सवाल है कि सोशल मीडिया पर घंटों बिताकर आप कितने फायदे या नुकसान में हैं, ये आप ही को तय करना है। क्या आपके पास इतना बेकार वक्त है जिसे आप सोशल मीडिया के जरिए जाया करना चाहते हैं, या फिर उसका कुछ सार्थक इस्तेमाल – पढ़ने में, खेलकूद में, अपने करियर से जुड़े कामकाज में, परिवार के साथ या किसी और ऐसे तरीके से करना चाहते हैं जिससे आपका कोई नुकसान न हो, या फिर यूं ही अपना कीमती वक्त गंवा देना चाहते हैं। इस मुद्दे पर एक ब्लॉग के जरिए मिली ये राय बिल्कुल सही लगती है-
The expression “killing time” is actually an incredibly accurate description of what happens when someone spends hours on Facebook or Twitter, but never seems to have enough time for homework or personal projects.
You have the power to change the world, but—more importantly—you also have the power to change your world. Chances are you have goals you would like to pursue, or a project you’d like to work on. Whether or not you realize it, you have the time. You, just like everyone else in the world, have 1,440 minutes every single day. How you spend those minutes is up to you.”[4]
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इंटरनेट आधुनिक दौर में सूचना और संचार से लेकर जीवन के हर पहलू तक जरूरी हो चुका है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि हम इसका सार्थक इस्तेमाल करें, खासकर सोशल मीडिया के दायरे में तो ये और भी जरूरी है। सवाल है इसके लिए क्या किया जा सकता है। पहली बात तो ये कि अपनी जिंदगी व्यवस्थित बनाइये, अपनी प्राथमिकताएं तय कीजिए, अपने जीवन में अनुशासन लाइये, ये तय कीजिए कि पहले क्या करना जरूरी है। दूसरी बात, ये कतई जरूरी नहीं कि सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वो सब पढ़ा जाए और सब पर अपने कमेंट दिए ही जाएं। इनमें भी प्राथमिकता तय की जा सकती है, संबंधों के आधार पर, अपनी दिलचस्पी और रुचियों के आधार पर । जिस तरह मेलबॉक्स में आनेवाले हर ई-मेल को पढ़ना जरूरी नहीं, उस तरह सोशल साइट्स पर आनेवाले पेस्ट्स को भी जरूरत के मुताबिक पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। खुद को सक्रिय रखने के लिए कभी-कभार अपना स्टेटस अपडेट जरूर करें, दोस्तों के जन्मदिन पर बधाइयां जरूर दें, और आपको संबोधित मेल या संदेश का जवाब देना तो बनता है, लेकिन फिजूल के संदेशों से परहेज करना जरूरी है। तीसरी बात, ये भी तय करना होगा कि आप रोजाना कितना वक्त सोशल साइट्स को दे सकते हैं। इसके लिए ये जरूरी है कि आप स्मार्टफोन के बजाय डेस्कटॉप पर सोशल साइट्स का इस्तेमाल करें। इससे आपका समय भी बचेगा और धन भी, क्योंकि मोबाइल पर इंटरनेट का भी खर्च लगेगा और बैटरी भी डिस्चार्ज होगी। स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया के संदेशों के नोटिफिकेशन हासिल करने की सुविधा ऑफ करके भी आप काफी हद तक इनसे बचे रह सकते हैं। इससे आपके कामकाज और गतिविधियों में सोशल मीडिया के संदेश बाधक भी नहीं बनेंगे। हर कामकाज और गतिविधि में तार्किक होना बेहद जरूरी है कि आप अमुक काम किसलिए कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं। ये बात सोशल मीडिया पर भी इस तरह लागू होती है कि अगर आप पॉर्न या पॉलिटिक्स में दिलचस्पी नहीं रखते तो उससे जुड़े संदेशों को क्यों देखें और क्यों लाइक करें(चुंकि हेडिंग या झलक भर से खत के मजमून का अंदाजा लगाया जा सकता है, लिहाजा पूरे संदेश को पढ़ने की जहमत उठाना कतई जरूरी नहीं)। इस तरह, थोड़ा सोच-विचारकर, स्मार्टफोन पर भी अगर आप स्मार्ट तरीकों से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, तो आपका फायदा ही होगा, नुकसान नहीं!!!!!
-          कुमार कौस्तुभ


[1] http://johnrmeese.com/killing-time/
[2] http://johnrmeese.com/killing-time/
[3] http://www.briangardner.com/killing-your-soul/
[4] http://johnrmeese.com/killing-time/